नास्तिक होने के 10 लक्षण कौन-कौन से हैं?

भारत में नास्तिकता की परिभाषा अलग-अलग समय पर, अलग-अलग महापुरुषों की नज़र में अलग अलग रही है। कुछ लोग वेद की सत्ता में विश्वास नहीं करने वाले को नास्तिक कहते हैं। कुछ लोग कहते हैं यदि आप खुद में विश्वास नहीं करते, तो नास्तिक हो। कुछ कहते हैं कि ईश्वर में विश्वास नहीं करने को नास्तिक कहते हैं।

ऐसे लोग भी हैं जो कहते हैं कि आप जीवन के प्रति यदि नकारात्मक सोचते हैं, तब नास्तिक हैं। कुछ लोग कहते हैं कि यदि आप मानवता में विश्वास नहीं करते तभी नास्तिक हैं, वरना आस्तिक। हालाँकि पश्चिम में इतनी परिभाषायें नहीं हैं। यदि आप दैवीय सत्ता में विश्वास नहीं करते, तब नास्तिक हैं। बिल्कुल आसान सी परिभाषा है, वहां। इस पर आप विस्तार से चाहें तो नास्तिक भारतपर जाकर पढ़ सकते हैं।

तस्वीर 'द फ़िक्स.कॉम' से साभार।

अब आते हैं, नास्तिक के लक्षण पर। उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम नास्तिक के निम्न दस लक्षण होते हैं, ऐसा कह सकते हैं:
  1. नास्तिक तर्कशील होता है। किसी बात को मानने के पहले अपनी बुद्धि, विवेक और अनुभव से काम लेता है। ऐसा नहीं कि किसी ने कह दिया और वह मान लेता है।
  2. नास्तिक किसी बात को इसलिए नहीं मान लेता कि बहुत सारे लोग उस बात को मान रहे हैं। अर्थात वह भेड़चाल में यकीन नहीं करता। वह यह भी मानने में हिम्मत करता है कि कई बार बहुसंख्यक लोग भी गलत हो सकते हैं।
  3. नास्तिक किसी बात को लेकर पूर्वाग्रह नहीं पालता। जब जो विषय उसकी समझ और अनुभव में आ जाता है, उसे स्वीकार कर लेता है। ऐसा नहीं सोचता कि लोग क्या कहेंगे?
  4. व्यक्ति, समाज और दुनिया के प्रति एक आलोचनात्मक दृष्टि रखता है। किसी चीज, व्यव्हार, व्यक्ति, परम्परा आदि को जितना तक संभव है, तथ्य जुटाता है। आखिर में ज्यादा तर्क और थोड़ा सम्भावना में भी यकीन कर निर्णय लेता है।
  5. नास्तिक व्यक्ति अपनी नैतिकता किसी धर्म ग्रन्थ, किसी भगवान, अल्लाह, गॉड आदि को गिरवी नहीं रखता। उसकी नैतिकता इंसानियत की परवाह करने के कारण है। इसलिए नहीं कि बाबा लोग, पुजारी, समाज, धार्मिक ग्रन्थ, परंपरा आदि उसपर क्या कहते हैं। इसलिए वह पुरानी और बेकार नैतिकता को त्याग भी कर सकता है तथा नई नैतिकता भी अपनी समझ और विवेक से गढ़ सकता है।
  6. नास्तिक सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार भी करता है यदि उसे यह लगता है कि वह समाज और मानवता के लिए खतरनाक है। जैसे जाति व्यवस्था, सती प्रथा, बाल विवाह, दहेज़ प्रथा, अंधश्रद्धा, ओझा-गुणी आदि।
  7. नास्तिक कर्म में विश्वास करता है। भाग्य, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक, बैतरनी, यमराज, पुनर्जन्म, अवतारवाद, ईश्वरवाद आदि में विश्वास नहीं करता। वह इसलिए कि उसके बारे में उसे कोई प्रमाण नहीं होता। बिना तर्क से संतुष्ट नहीं होता। जो लोग उसके बारे में कहते रहे हैं, वह उसे ढ़ोकर पूर्वजों से लाये हैं। उनका अपना अनुभव नहीं होता।
  8. नास्तिक व्यक्ति विज्ञान, इंसानियत, व्यक्ति-व्यक्ति के बीच समता, स्वतंत्रता, निजता, मानवाधिकार आदि की क़द्र करता है। वह इसलिए कि उसे किसी ईश्वर को खुश नहीं करना होता, बल्कि उसके लिए इन्सान, जीव और जगत ही सच होते हैं, वह किसी परलोक में यकीन नहीं होता।  
  9. नास्तिक ज्ञान और विज्ञान के प्रसार में यकीन करता है। ज्ञान को समस्त मानवता की निधि मानता है। ऐसे में उसपर कब्ज़ा करना अथवा छुपाना मानवता के साथ अन्याय करना और अनैतिक लगता है।
  10. नास्तिक चर्चा और बहस से नहीं डरता। उसे हार जीत की तरह भी नहीं लेता। संवाद को वह ज्ञान के लिए ज़रूरी समझता है। नास्तिक देश समाज के बारे में सिर्फ चर्चा नहीं करता, बल्कि उसे बेहतर बनाने के लिए कदम भी उठाता है। वह शिक्षक हो सकता है, संगठनकर्ता, वैज्ञानिक, कृषक, पर्यावरणवादी, डॉक्टर, वकील, राजनेता आदि कुछ भी हो सकता है। पर वह पंडा, पुरोहित, मुल्ला, पादरी आदि नहीं हो सकता
       – शेषनाथवर्णवाल 

       यह लेख सबसे पहले कोरा  के लिए लिखा गया था।