"हम सब इंसान हैं, हम पर बचपन से ही धर्म का ठप्पा क्यों?"


धर्म की खोज के कई सौ साल बीत गए लेकिन धर्मों के प्रति लोगों का आकर्षण कम नहीं हुआ है। कुछ अपवादस्वरूप विकसित देश जरुर हैं, जहाँ धर्म धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं अथवा ऐसा कहें कि धर्म के प्रति पागलपन में कमी आती जा रही है। उनके लिए ईसाई अथवा हिन्दू-मुस्लिम होना जरुरी नहीं रह गया है। वे बस खुद को इन्सान के रूप में पहचाने जाने की अपील करते हैं। उनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो धर्म और उनकी मान्यताओं को समाज के लिए खतरनाक मानते हैं। वे कहते हैं कि धर्मों द्वारा समाज में कटुता पैदा की जा रही है।

राजनीति में धर्मों का इस्तेमाल और भी घातक है। हिन्दू-मुसलमान आपस में लड़ रहे हैं, मुसलमान-ईसाई से, ईसाई किसी और से और फिर सब एक दुसरे से। इससे समाज में हिंसा पैदा हो रही है। इन्सान-इन्सान में भेदभाव पैदा हो रहा है और हर धार्मिक मतावलंबी अपने धर्म को बेहतर बता रहा है।

नास्तिकों की पहचान को सरकार को क्यों मान्यता देनी चाहिए?



कोलकाता के बेथुन कॉलेज हाल में काफी चर्चित रहा, वह इसलिए क्योंकि वहाँ नए विद्यार्थियों के एडमिशन फॉर्म में अन्य धर्मों के साथ ह्यूमैनिटी का एक नया विकल्प भी भरने के लिए था। हिन्दू, ईस्लाम, ईसाई, सिक्ख, जैन, बौद्ध आदि धर्मों से अलग 'ह्यूमैनिटी' को एडमिशन फॉर्म में रखना वैसे तो काफी अच्छी पहल है। वैसे भी सभी धर्म ह्यूमैनिटी यानि मानवता का दावा करते हैं, ऐसे में किसी को उससे क्या आपत्ति हो सकती है।

लेकिन जिस तरह से मानवता से अलग हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि होने की भारत में हर व्यक्ति को अधिकार है, उसी प्रकार नास्तिक होने का भी है। भारत का संविधान तो हर व्यक्ति को अपने विचार, विश्वास और उपासना आदि की स्वतंत्रता देता है। ऐसे में क्यों नहीं भारत के सभी सरकारी संस्थानों व गैर-सरकारी संस्थानों में जहाँ भी धर्म का कॉलम हैं, वहां ‘नास्तिक’ अथवा ‘कोई धर्म नहीं’ भरने का विकल्प उपलब्ध हो?

ज़िंदगीनामा: एक मामूली लड़के की आत्मकथा

महेंद्र कुमार अपने फेसबुक प्रोफाइल में लिखते हैं, "रिलेशनशिप मुक्त, संतान मुक्त, धर्म मुक्तनास्तिक, स्पष्टवादी, शाकाहारी, बहुआयामी, पागल, देशी।" उनके फेसबुक पोस्ट भी रेडिकल और सामान्य से काफी अलग। ऐसे व्यक्ति की आत्मकथ्य पढ़ने में कुछ अलग तो लग सकता है, जो हमारे सामाजिक नियम कानून व संस्कार से अलग हों, पर कई बातें हमें सोचने को मजबूर करती हैं। जीवन के प्रति उनकी दृष्टि बेशक नया और खोजी की दृष्टि है। आईये पढ़ते हैं, उनकी कहानी उन्ही की जबानी और शुरू करते हैं, उनके सामान्य परिचय से।
                                                                                                                   – संपादक

महेंद्र कुमार की तस्वीर उनके फेसबुक प्रोफाइल से 






नाम- महेंद्र कुमार, पता जोधपुर, राजस्थान, उम्र- 22 वर्ष, शिक्षा- स्नातक, धर्म- नास्तिक/ मानवतावादी, शौक- लेखनसंगीत सुननानये लोगों से मिलना। प्रेरणादायक शख्सियत- संजय दत्तओशोनिक  वुजिकिक तथा पंसदीदा बालीवुड फिल्म- मदर इंडिया।

नास्तिकता की शुरुआत

जब मैं छठी कक्षा में पढता था,  तब वहाँ के हेडमास्टर श्रीमान् रूगाराम जी थे,  वह बहुत तार्किक थे। कक्षा में कभी - कभी ईश्वर,  धर्म अंधविश्वासों तथा ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा होती थी। रूगाराम जी ने ईश्वर के अस्तित्व को लेकर अपने निजी मत रखे थे, फलस्वरूप मैं ईश्वर के अस्तित्व तथा धर्मों की उत्पत्ति को लेकर चिंतन करने लगा। उस समय मेरी जिज्ञासा चरम पर थी, मानव की उत्पत्ति, पृथ्वी पर जीवों का उदभव, ब्रहांड के रहस्यों इत्यादि के सवालों के जवाब चाहिए थे।

साइंस में मैंने डार्विन का सिद्धांत, बिग बैंग थ्योरी, जीवों की उत्पत्ति इत्यादि प्रकरणों को पढना शुरू कर दिया। कुछ वैज्ञानिक तथा दार्शनिकों के ईश्वर पर निजी मत भी पढे। उसके बाद मैं सोशल मीडिया से जुड़ गया,  वहाँ पर मुझे मेरी विचारधारा के लोग मिलने लगे। मैंने भगत सिंह को पढ़ा तथा उन्हीं का  बहुचर्चित लेख "मैं नास्तिक कयों हूँ" पढ़ा तथा स्टीफन हांकिग के ईश्वर के अस्तित्व को नकारने के सिद्धांत भी पढे। 

60 हज़ार रूपये में आप भी बदल सकते हैं, अपनी किस्मत की रेखा

बेटा तुम्हारे हाथों की रेखाएं बता रही है कि तुम्हारी शादी नहीं हो सकती, रोज़गार में बरकत नहीं और परिवार में भी सुख नहीं है।  शहरों में 5 सितारा दुकानों से लेकर नुक्कड़ के फुटपाथ तक हाथ देखने वालों की कमी नहीं है। करोड़ों रूपये का कारोबार हाथों की रेखाओं के दम पर किया जाता है और हिंदुस्तान में यह बीमारी कई सौ सालों से अपनी दुकान जमाये है।

आइये विज्ञान की नज़र से जानते है कि हाथों में बनी ये लकीरे क्यों बनती है और इनकी मानव शरीर में क्या उपयोगिता है।

हस्त रेखाओं को विज्ञान की भाषा में Palmar Flexion Creases कहा जाता है और इनका निर्माण गर्भ में ही भ्रूण के 10 वे सप्ताह में होने लगता है। मुख्य रूप  से यह रेखाएँ अनुवांशिक रूप में भी आकार लेती है और जन्म से ही बच्चों के हाथो में देखी जा सकती है।

एक प्रयोग करें! अपनी हाथों की रेखाओं को अपने माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्यों की रेखाओं से मिलाने  प्रयास करें। आप हैरान होंगे कि कई बार 95% से भी ज्यादा समानता के साथ ये रेखाएँ और उनकी बनावट अन्य सदस्यों के हाथो की रेखाओं से मिलती हैं।

बात यह है कि जिस तरह हमारा रंग, रूप, नैन, नक्श आदि परिवार पर जाते हैं, उसी तरह हाथों की लकीरें भी। यह एक सामान्य शारीरिक घटना है।

जानिए ! क्या है जिद्दु कृष्णमूर्ति का असली चमत्कार?



जिद्दु कृष्णमूर्ति का असली चमत्कार भारतीयों को भारतीयों की भाषा में समझाया नहीं गया है। उनके गहरे मित्र और समर्थकों ने भी अभी तक बहुत ही ईमानदारी से कृष्णमूर्ति का प्रचार करने की कोशिश की है। उन्होंने भारतीय मन की कमजोरियों का लाभ उठाकर कृष्णमूर्ति का प्रचार नहीं किया है। इसीलिये कृष्णमूर्ति को लोग न तो जानते हैं, न समझते हैं।

लेकिन ओशो रजनीश और जग्गी वासुदेव या रविशंकर जैसे लोगों ने भारतीय मन की कमजोरियों का फायदा उठाते हुए खुद को बहुत ही व्यवस्थित ढंग से प्रचारित किया है। इसीलिये न सिर्फ लोग उन्हें जानते हैं बल्कि उनकी पूजा भी करते हैं। इन लोगों ने भारतीयों का कितना हित या अहित किया है ये बात अलग है, इसका हिसाब लगाना हालाँकि बहुत आसान है।

इनके शिष्यों की जिन्दगी में थोड़ा-सा गहराई से झांकिए सब पता चल जाता है। इनके अंधविश्वास, भाग्यवाद और गुरु पर हद दर्जे की निर्भरता (जिसे ये गुरुभक्ति कहते हैं) से साफ़ पता चलता है कि इन गुरुओं ने नुक्सान ही अधिक पहुँचाया है और अभी भी पहुंचा रहे हैं।

आइये कृष्णमूर्ति को भारतीय मन के ढंग से समझते हैं। हालाँकि यह ढंग बिलकुल ही गलत है लेकिन इसके प्रति चेतावनी जाहिर करते हुए मैं ये पोस्ट लिख रहा हूँ। इसका उद्देश्य सिर्फ इतना ही है कि कृष्णमूर्ति को न जानने वाले लोगों को ये पता चल सके कि कृष्णमूर्ति सामान्य बाबाओं से किस तरह भिन्न हैं। कितने इमानदार, बोल्ड और कितने खालिस जमीनी इंसान हैं। यह बताना इसलिए भी जरुरी है कि भारतीय मन चमत्कार में ही भरोसा करता है। इमानदारी यहाँ चमत्कार नहीं है इंसानियत यहाँ चमत्कार नहीं है। जब तक ये न बताया जाए कि किसी ने करोड़ों रुपयों को लात मार दी तब तक लोग त्याग को भी नहीं समझते।

वैज्ञानिक मानवतावाद के कुछ मूल प्रश्न: एक इंटरव्यू

यह लेख काल्पनिक इंटरव्यू के आधार पर तैयार की गई है जिसका मुख्य उद्देश्य अपने साथियों और जनता के बीच वैज्ञानिक मानवतावाद के बारे में सही संदेश को पहुंचाना है। तो पढ़िए और खुद अपने तर्कों व अनुभवों के आधार सही-गलत का निर्णय लीजिये।



प्रश्न: आप किस धर्म को मानते हैं?

उत्तर: हम किसी स्थापित धर्म को नहीं मानते और उनके मतों और सिद्धांतों के मामले में हम निरपेक्ष दृष्टि रखते हैं। हमारे लिए मत पंथ जिनकी बहुसंख्य बातें कटटर और अवैज्ञानिक है, अस्वीकृत है। धर्म का अर्थ अगर चारित्रिक उन्नति, प्रेम का बिना किसी भेदभाव के विस्तार है और धरती के जीवन को सम्पूर्ण रीती सुखी बनाने का प्रयास है तो हमारा कोई भेद नहीं। लेकिन धर्मो का इतिहास और वर्तमान इसके उलट ही है इसलिए तार्किक रूप से वे सभी अयोग्य है।

प्रश्न: तो क्या आप सभी धर्मों के विरोधी हैं?

उत्तर: हम उन समस्त वादों और मान्यताओं का विरोध करते हैं जो कि किसी अलौकिक सत्ता में विश्वास करती हैं और मनुष्य मनुष्य को आपस में किसी भी लेबल के आधार पर बाँटती है।

प्रश्न: अगर ईश्वर नहीं है तो धरती को किसने बनाया यह सारा ब्रह्मांड कौन चला रहा है?

उत्तर: ब्रह्मांड का बनना और चलना एक प्राकृतिक घटना है इसकी उत्पत्ति पर अभी विज्ञान रिसर्च कर रहा है परंतु अब तक प्रचलित थ्योरीज़ में बिग बैंग थ्योरी सर्वाधिक स्वीकृत है तथा उसमे भी समय के साथ अधिक तर्कपूर्ण बातें सामने आ रही है; अतः हम भी इसी अनुसार इसकी व्याख्या करते हैं। क्योंकि अगर इस ब्रह्मांड का बनाने वाला कोई ईश्वर होता तो उसे किसने बनाया यह प्रश्न फिर भी शेष रहता? और अगर जो यह मानते हैं कि उसको किसी ने नहीं बनाया वह अपने आप प्रकट हुआ तो फिर इस हिसाब से ब्रह्मांड को अपने आप प्रकट होने वाला भी माना जा सकता है।

प्रश्न: लेकिन जगत की हर चीज जैसे टेबल कुर्सी आदि सभी का कोई न कोई बनाने वाला होता ही है?

उत्तर: देखो जगत में किसी चीज़ का बनना दो प्रकार से होता है एक तो किसी व्यक्ति द्वारा दूसरा प्राकृतिक घटनाओं के संयोग से। कारपेंटर कुर्सी बनाता है टेबल बनाता है लेकिन एक बार बनने के बाद वह टेबल कुर्सी नित्य बढ़ते घटते नहीं रहते, लेकिन ब्रह्मांड कोई ऐसा नहीं है कि पहली बार जैसा बना अब तक वैसा ही है। वह प्रतिक्षण बढ़ रहा है फैल रहा है। निरंतर परिवर्तनशील है ; जैसे दूध से दही कोई व्यक्ति नहीं बनाता, वह तो दही के जीवाणु की दूध के साथ क्रिया का परिणाम है ऐसे ही विश्व की उत्पत्ति और जीवन भी प्राकृतिक रासायनिक एवं जैविक घटनाओं का परिणाम है।

"आध्यात्मिक धर्म इंसानों को जोड़ता नहीं, बल्कि तोड़ता है"

हमारे देश भारत में धार्मिक बनना सहज है, हम सभी को पैदा होते ही धर्म को घुट्टी की तरह पिलाया जाता है। जबकि नास्तिक बनना इतना सहज नहीं होता है। जब हम शिक्षित होते हैं, अपने मन में उठे सवालों के तार्किक उतर ढूंढते हैं। धीरे-धीरे हमारे भीतर वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास होने लगता है, और तभी सही मायने में हम हेतुवादी या नास्तिक बन पाते हैं।

मैं एक धार्मिक या धर्मभीरु परिवार में जन्मी हूं। बचपन से ही हमारे घर में बारहों महीने हर दिन कुछ न कुछ धार्मिक आडंबर होते हुए देखती रहती थी। पर मेरे मन में हमेशा कुछ न कुछ सवाल उठता था, जैसे कि ये पुरोहित जब घर में आता है, कुछ श्लोक बोल कर  पता नहीं क्या पूजा के नाम पर ढोंग करता है। जबकि उससे उम्र में काफी बड़े मेरे दादा-दादी भी उस पुरोहित के पैर छूते थे और धोते थे। मुझसे इस तरह की मानसिक गुलामी देख कर सहन नहीं होता था। लोग इतना पूजा पाठ क्यों कर रहें है? इससे होता क्या है? क्या हासिल हो जाता है? आदि आदि।

घर में तो हमेशा कलह लगा रहता था। केवल लड़का की चाह में छः लड़कियां हो गयीं, इससे पारिवारिक समस्याएं और बढ़ती गयी। घण्टों पूजा करती हुई मां गुस्से में रहती थी और वहीं से बीच बीच में हमें डांटती भी रहती थी। पूजा करने वालों के मन तो शांत रहना चाहिए न! फिर यह कैसी पूजा है? 

पेरियार द्वारा ईश्वर को पूछे गए वो सवाल, जो हर 'तर्कशील' को जानना चाहिए



आज़ादी से पहले और इसके बाद भी दक्षिण भारतीय राज्यों, खासकर तमिलनाडु में पेरियार का बड़ा ही गहरा असर रहा है। दक्षिण भारतीय लोग उनका बहुत अधिक सम्मान करते हैं। पेरियार के नाम से प्रसिद्द, ई. वी. रामास्वामी का न केवल सांस्कृतिक बल्कि तमिलनाडु के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्यों पर भी असर इतना गहरा है कि चाहे कम्युनिस्ट हों या दलित आन्दोलन से जुड़े लोग, सब उनसे प्रभावित रहे हैं। 

तमिल राष्ट्रभक्त से लेकर नास्तिकों, तर्कवादियों और नारीवाद की ओर झुकाव वाले भी उनका सम्मान करते हैं। उनके विचारों व कार्यों का हवाला देते हैं और उन्हें एक मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं। तर्कवादी, नास्तिक और वंचितों के हित में बोलने व कार्य करने के कारण, उनकी सामाजिक और राजनीतिक ज़िंदगी ने कई उतार चढ़ाव देखे। 

इरोड वेंकट नायकर रामासामी (17 सितम्बर, 1879-24 दिसम्बर, 1973) जिन्हें पेरियार के नाम से अधिक जाना जाता हैं, बीसवीं सदी के तमिलनाडु के एक महत्वपूर्ण और लोकप्रिय राजनेता थे। उनकी उपाधि पेरियार, दरअसल तमिल में सम्मानित व्यक्ति के लिए प्रयोग किया जाता है।

नास्तिकों से हर धर्म-सम्प्रदाय के लोगों को क्यों खतरा रहता है?



नास्तिकों से हर धर्म और सम्प्रदाय के लोगों को खतरा रहता है। वे नहीं चाहते कि कोई पीढ़ी सोचने समझने वाली और तर्क करने वाली पैदा हो। इसके कई कारण हैं। पहला तो सोचने समझने वाले व्यक्ति को कंट्रोल करना असान नहीं होता, वह देर सबेर अपनी दृष्टि दुनिया और समाज के प्रति विकसित कर ही लेता है। उसे गुलाम बनाना आसान नहीं होता। 

वह गलत और संशय प्रतीत होने पर आपसे सवाल पूछ सकता है। आपके विचार से अलग एक विकल्प सुझा सकता है। आप विचार और कार्यों कि आलोचना कर सकता है। आप नहीं सुधरे तो आपका विरोध भी कर सकता है. तो तर्क और सोचने-समझने के बड़े खतरे हैं, उनके लिए, जो चाहते हैं सत्ता उन्हीं के पास रहे। धन और दबंगई उनके पास ही रहे।

ईश्वर पूजा के नाम पर पर्यावरण का 'कचरा' मत करिए ...प्लीज !!



हमारे धर्मों में ईश्वर की पूजा हो, मंदिरों-मस्जिदों की सजावट हो या दरगाह पर चढ़ने वाली चादरें, फूलों का हमसे अटूट सम्बन्ध है। और सिर्फ पूजा ही क्यों, शादियों में, जलसों में, सजावट में हर जगह फूल हमारी जिंदगी से जुड़े ही रहते हैं यहाँ तक की मरने के बाद तस्वीरों पर चढ़ने वाले हार के रूप में भी।

हम फूलों को अपनी भावनाओं से अपनी श्रद्धा से जोड़कर देखते हैं मंदिरों के प्रांगण में फूलों की टोकरियों को लेकर जब हम अपने इष्टदेव पर चढ़ाते हैं, मानो दिल को एक तस्सली होती है कि पूजा ठीक से हुई। लेकिन इस सुन्दर मोड़ के बाद की भयावह कहानी आपमें से कितने लोग जानते हैं

अगर हम पूछें कि आपके फूल चढाने के बाद अगले दिन ये फूल कहाँ जाते हैं, तो आपमें से कई लोग कहेंगे, इन पवित्र फूलों को कचरे के डिब्बे में फेक नहीं सकते; इसलिए इन्हे किसी स्थानीय सरोवर, नदी या कुए में विसर्जित कर दिया जाता है, और मुंबई जैसे शहरों में अतंतः समुद्र में।  चलिए अब आगे की कहानी हम आपको बताते हैं

वैज्ञानिक तथ्य: हवन में एक चम्मच घी से कितना ऑक्सीज़न पैदा होता है?



आजकल देश के धार्मिक जगत में विज्ञान की धूम मची हुई है।  हर कोई प्राचीन धर्मशास्त्रों की पुरानी बातों में नया विज्ञान ढूंढ रहा है, और असल विज्ञान न मिले तो न सही, नक़ल को ही असल समझा कर बेचा जा रहा है। क्या ज्योतिष, क्या वास्तुशास्त्र और क्या ध्यान-योगासन, सभी वैज्ञानिकता का बाना पहन कर नए-नए मैकअप कर मैदान में उतर रहे है। जिन बाबाओं और पीरों ने छठी कक्षा तक भी विज्ञान नहीं पढ़ा है, वे भी खुद को साईंटिस्ट बनाकर खूब जेब काट रहे है। 

वायु प्रदुषण के इस भीषण संकट में एक और दावा सुर्ख़ियों में है, हवन की वैज्ञानिकता का। हज़ारों साल पहले निकले इस वैदिक कर्मकांड को बारिश करवाने से लेकर वायु प्रदुषण दूर करने और जरुरत पड़ने पर एड्स, कैंसर और मधुमेह जैसी गंभीर बीमारियों तक को दूर करने वाला साबित किया जा रहा है। 

हवन की वैज्ञानिकता की बात निकली तो हमारे अंधभक्त भाई-बहन न आगे देख रहे हैं, न पीछे। एक खबर के अनुसार, बीते साल मेरठ में 500 क्विंटल लकड़ियों को हवन में जलाकर एक संगठन ने जबरदस्त वाहवाही लूटी, आखिर पर्यावरण संतुलन का अचूक उपाय जो कर रहे थे। 

एक नास्तिक की नज़र में चार 'खतरनाक' किताबें



मेरी नज़र में ऐसी चार किताबें हैं जिनसे सामान्य जीवन जीने की लालसा करने वाले युवाओं को दूर रहना चाहिए। दूर इसलिए रहना चाहिए कि इन किताबों को पढने के बाद आप नास्तिक, व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़े करने वाले अथवा नई नैतिकता की बात करने वाले व्यक्ति होने का खतरा पालेंगे। ऐसी चार किताबें मेरी नज़र में निम्न हैं

पहली किताब है, भगत सिंह द्वारा लिखित मैं नास्तिक क्यों हूँ?” यह इसलिए खतरनाक किताब है कि इसको पढने के बाद आपके सोचने समझने का तरीका बदल जायेगा। आप शायद हर चीज को तर्क और मानवता के लिए उपयोगिता के आधार पर देखने लगेंगे। आप धर्म और ईश्वर के नाम पर जारी सभी आडम्बर, भेदभाव, शोषण, अंधश्रद्धा अदि को जानने समझने की दृष्टि विकसित कर सकते हैं। साथ ही इन व्यवस्थाओं पर प्रश्नचिन्ह लगाना शुरू कर देंगे। 

हमारे लिए अस्पताल हैं, लेकिन उन निरीह जानवरों का क्या?



इस दुनिया में आना ही एक दुःख है, एक दर्द है। कुछ दुःख और दर्द ऐसे हैं जो हमारी नजरें देख नहीं पाती, और अगर देख भी लें तो महसूस करना फ़िज़ूल सा लगता है। हरेक की पसंद अलग-अलग होती है। किसी को फिल्में देखना पसंद होता है, तो किसी की टीवी के धारावाहिको में जान अटकी रहती है। वहीं कुछ लोगों की पसंद इन सबसे इतर डिस्कवरी जैसे चैनल भी होते हैं।
  
कभी-कभी जब फिल्मों के काल्पनिक दुनिया से मन ऊब-सा जाता है, तो मैं भी डिस्कवरी की दुनिया में अपना सुकून तलाशने लगती हूँ। इसी दौरान मैंने एक ऐसा परिदृश्य देखा जिसने मुझे गहराईओं से सोचने पर मजबूर कर दिया। कई सवाल मुझे बेचैन करने लगे।

हम खुद को इंसान कहते हैं। भगवान् की गाथाओं का वर्णन, उनकी दयालुता का वर्णन, उनकी करुणा का वर्णन करते हम कहाँ थकते हैं? लेकिन उस हिरन के लिए भी कोई दयालु, करुण भगवान् है? जो शेरों के एक झुण्ड के बीच में अपनी जान बचाने की जद्दोजहद में है। शायद नहीं...!!

"नास्तिक होने से आज भी बहुत सी अड़चनें आती हैं"



मैं राजस्थान का रहने वाला हूँ, राजस्थान में सबसे ज्यादा पाखण्ड है। मेरी उम्र 27 साल है। मैं एक वर्ष से नास्तिकता के सफ़र पर चल रहा हूँ। मेरे घर में पूजा-पाठ-मन्दिर-भगवान में विश्वास को लेकर आज भी दबाव बनाया जाता है। लेकिन वो जब भी बात छिड़ती है, बहस शुरू हो जाती है। मेरे परिवार में देवी-देवताओं में एवं दैवीय शक्तियों में गहरा विश्वास रखते हैं। ऐसे में इन देवी-देवताओं और इनकी शक्ति को नकारना व भगवान के अस्तित्व पर प्रश्न खड़े करना मेरे लिए बहुत कठिन बात थी।

नास्तिक होने से आज भी बहुत सी अड़चनें आती हैं। आज भी दोस्तों-परिजनों से बात करते देवी-देवताओं पर कटाक्ष करना एवं उनका मेरी बातों पर सहमत न होना कभी-कभी बहस में अकेला महसूस करना इत्यादि।

मैं भी पहले मन्दिरों में भगवान के दर्शन के लिए जाया करता था, लेकिन जब मैंने कई ऐसी घटनाएं देखीं तब से आस्था ख़त्म हो गयी। अगर वास्तव में भगवान है, तो गरीब-अबला पर हो रहे अत्याचारों के लिए दोषियों को दण्ड क्यों नहीं देते, क्यों उन्हें भगवान का डर नहीं है?

भगत सिंह का ऐतिहासिक लेख - "मैं नास्तिक क्यों हूँ?"





यह लेख भगत सिंह ने जेल में रहते हुए लिखा था और यह 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार द पीपलमें प्रकाशित हुआ । इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण , मनुष्य के जन्म , मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता , उसके शोषण , दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है । यह भगत सिंह के लेखन के सबसे चर्चित हिस्सों में रहा है।

स्वतन्त्रता सेनानी बाबा रणधीर सिंह 1930-31 के बीच लाहौर के सेन्ट्रल जेल में कैद थे। वे एक धार्मिक व्यक्ति थे जिन्हें यह जान कर बहुत कष्ट हुआ कि भगतसिंह का ईश्वर पर विश्वास नहीं है। वे किसी तरह भगत सिंह की कालकोठरी में पहुँचने में सफल हुए और उन्हें ईश्वर के अस्तित्व पर यकीन दिलाने की कोशिश की। असफल होने पर बाबा ने नाराज होकर कहा, “प्रसिद्धि से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है और तुम अहंकारी बन गए हो जो कि एक काले पर्दे के तरह तुम्हारे और ईश्वर के बीच खड़ी है। इस टिप्पणी के जवाब में ही भगतसिंह ने यह लेख लिखा।

एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। क्या मैं किसी अहंकार के कारण सर्वशक्तिमानसर्वव्यापी तथा सर्वज्ञानी ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करता हूँ? मेरे कुछ दोस्त – शायद ऐसा कहकर मैं उन पर बहुत अधिकार नहीं जमा रहा हूँ – मेरे साथ अपने थोड़े से सम्पर्क में इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये उत्सुक हैं कि मैं ईश्वर के अस्तित्व को नकार कर कुछ ज़रूरत से ज़्यादा आगे जा रहा हूँ और मेरे घमण्ड ने कुछ हद तक मुझे इस अविश्वास के लिये उकसाया है। 
मैं ऐसी कोई शेखी नहीं बघारता कि मैं मानवीय कमज़ोरियों से बहुत ऊपर हूँ। मैं एक मनुष्य हूँऔर इससे अधिक कुछ नहीं। कोई भी इससे अधिक होने का दावा नहीं कर सकता। यह कमज़ोरी मेरे अन्दर भी है। अहंकार भी मेरे स्वभाव का अंग है। 
अपने कामरेडो के बीच मुझे निरंकुश कहा जाता था। यहाँ तक कि मेरे दोस्त श्री बटुकेश्वर कुमार दत्त भी मुझे कभी-कभी ऐसा कहते थे। कई मौकों पर स्वेच्छाचारी कह मेरी निन्दा भी की गयी। कुछ दोस्तों को शिकायत हैऔर गम्भीर रूप से है कि मैं अनचाहे ही अपने विचारउन पर थोपता हूँ और अपने प्रस्तावों को मनवा लेता हूँ। यह बात कुछ हद तक सही है। इससे मैं इनकार नहीं करता। इसे अहंकार कहा जा सकता है। जहाँ तक अन्य प्रचलित मतों के मुकाबले हमारे अपने मत का सवाल है। मुझे निश्चय ही अपने मत पर गर्व है। 

भारत में क्यों कहा जाता है, 'धर्मो रक्षति रक्षितः'?


यह  वाक्यांश मनुस्मृति के 8वें अध्याय के 15वें श्लोक से लिया गया है मनुस्मृति हिन्दू धर्म का एक प्राचीन ग्रन्थ है यह सर विलियम जोन्स द्वारा 1776 में अंग्रेजी में अनुवादित किया गया। यह उन प्रथम संस्कृत ग्रंथों में से एक था, जिसका उपयोग ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार द्वारा हिंदू कानून बनाने के लिए किया गया था। पूरा श्लोक इसप्रकार है –

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ।

वाक्यांश का अर्थ है, जो लोग धर्मकी रक्षा करते हैं, उनकी रक्षा स्वयं हो जाती है। इसे ऐसे भी कहा जाता है, ‘रक्षित किया गया धर्म रक्षा करता है’। यहाँ ‘धर्म’ शब्द से आशय हिन्दू, इस्लाम, बौद्ध, जैन, ईसाई आदि से नहीं है।

धर्म का आशय है, व्यक्ति के अपने कर्त्तव्य, नैतिक नियम, आचरण आदि। जो व्यक्ति इनका पालन करता है, वह धर्म की रक्षा करने वाला होता है। प्राचीन धर्मशास्त्रों में धर्म के स्वरुप का विभिन्न रूप से वर्णन किया गया है। यह व्यक्ति के समाज में विशेष कर्म, कर्तव्य, आचरण आदि से जुड़ा है।

हम नास्तिक क्यों हैं, क्या सच में आप जानना चाहते हैं?



नास्तिकों या मुक्त बुद्धिवादियों के संबंध में अक्सर यह मान लिया जाता है कि इस प्रकार के लोग ईश्वर विरोधीधर्म, परंपरा विरोधी एवं सभ्यता संस्कृति के दुश्मन होते हैं। जनसामान्य की यह धारणा कई बार और उग्र होकर यह मान लेती है कि नास्तिकता का उद्देश्य ईश्वरधर्म आदि की सत्ता को नकार कर सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में, चाहे जैसा स्वछंद और मनमाना आचरण करना है।

स्वर्ग-नर्क और वहाँ होने वाले हिसाब-किताब को नकार कर नास्तिक धरती पर स्वच्छंद, वासना भोग को बढ़ाना चाहते हैं, यह धारणा वास्तव में बहुत शोचनीय और दुखद है। आज जहाँ दुनियाभर की पुस्तकें, दर्शन और व्यक्तियों के विचार आपकी उंगली के इशारे से आपके लिए उपलब्ध हो सकते हैं, ऐसी स्थिति में भी नास्तिकों या मुक्त बुद्धिवादियों के बारे में ऊपर कही गई बातों को सुन-सुना कर मान लेना संसार के उन महानतम विचारकों के साथ अन्याय है जिन्होंने नास्तिक रहने के बाद भी इस धरती पर मानव समाज का अन्यतम उपकार किया।

कई बार कुछ नास्तिक मित्र भी ऐसे मिल जाते हैं जो केवल धर्मों, ईश्वर और सामाजिक परंपराओं का मजाक उड़ाना और उल्टे-सीधे तर्कों से जन भावनाओं को आहत करने को ही अपने जीवन लक्ष्य मान बैठते हैं। उन्हें देखकर केवल यही कहा जा सकता है कि वह विध्वंसात्मक नास्तिक हैं, सर्जनात्मक नहीं। सृजनात्मक नास्तिकता विध्वंस और नकार के एक कदम और आगे की बात करती है। इसलिए यहां मैं सभी के लिए सृजनात्मक नास्तिकता के बारे में कुछ रूपरेखा स्पष्ट करना चाहूंगा।

क्या मनुष्य का मस्तिष्क भी पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को समझता है?



आपने पढ़ा ही होगा कि कुछ जीव-जंतु पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग नेविगेशन के रूप में करते है। अर्थात ये जीव-जंतु पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग कर दिशा का पता लगा लेते हैं। प्रवासी पंक्षी, समुद्री कछुए और कुछ प्रकार के बैक्टीरिया इसके सटीक उदाहरण हैं। अब सवाल है कि क्या मनुष्य का मस्तिष्क भी पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को समझता है?

एक नये शोध के अनुसार मनुष्य का दिमाग भी पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को भली-भांति समझता है। साइंस जर्नल eNeuro में प्रकाशित एक नया अध्ययन बताता है कि मस्तिष्क स्कैन के द्वारा इस तथ्य का प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है। मानव मस्तिष्क के चारों ओर फैले चुंबकीय क्षेत्र के कारण मस्तिष्क संकेतों में बदलाव आता है।

चुम्बकीय क्षेत्र का पता लगाने की क्षमता मानव मस्तिष्क में भी मौजूद होती है। पहली बार वैज्ञानिकों ने 1980 के दशक में यह सुझाव दिया था कि मानव मस्तिष्क भी पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को समझता है। लेकिन वैज्ञानिकों को मस्तिष्क के अध्ययनों में इस क्षमता का प्रमाण नहीं मिला।