एक नास्तिक की 'नो कास्ट, नो रिलिजन एंड नो गॉड सर्टिफिकेट’ के लिए संघर्ष


दोस्तों! ये हैं रवि कुमार नास्तिक। ये किसी जाति, धर्म, अथवा ईश्वर में विश्वास नहीं करते। जिस प्रकार लोग अपना जाति-प्रमाण पत्र और धर्म का प्रमाण-पत्र बनवाते हैं, उसी प्रकार ये अपने नास्तिक होने के प्रमाण-पत्र बनवाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।  

खुद के ईश्वर में विश्वास नहीं होने की बात को साबित करने के लिए हाईकोर्ट जाने वाले रवि कुमार का कहना है कि वह अपने प्रमाण-पत्र को गैर-आस्तिक घोषित करने के लिए लड़ेंगे। रवि का मानना है कि धर्म देश की अधिकांश समस्याओं का जड़ है।

ईश्वर शायद नहीं है। इसलिए चिंता छोड़ें और अपने जीवन का आनंद लें!



दोस्तोएवॉस्की ने कहा था कि अगर ईश्वर नहीं है, तो हमें उसका आविष्कार करना होगा, नहीं तो हर कोई हर कुछ करने के लिए स्वतंत्र हो जाएगा। इस महान रूसी लेखक की मृत्यु के 130 साल बाद भी नास्तिक इससे सहमत नहीं हो पाए हैं। बल्कि पिछले कुछ वर्षों से उनकी गतिविधियां कुछ तेज हुई हैं। इसके पीछे रिचर्ड डॉकिन्स की पुस्तक द गॉड डेल्यूजननाम की अत्यंत पठनीय किताब की भी कुछ भूमिका हो सकती है। यह किताब पहली बार 2006 में प्रकाशित हुई थी और तब से लगातार इंटरनेशनल बेस्टसेलर बनी हुई है। यह ईश्वर के अस्तित्व को आदमी की खामखयाली साबित करनेवाली दर्जनों पुस्तकों की सिरमौर है। 

मेरे पास पैसा होता, तो मैं इस पुस्तक का अनुवाद संसार की हर भाषा में करवाता और आधी कीमत पर लोगों को उपलब्ध करवाता। दिलचस्प यह है कि इस पुस्तक की एक प्रति मुझे इंग्लैंड के एक पादरी ने उपहारस्वरूप भिजवाई थी। उन्हें पता है कि मैं नास्तिक हूं। फिर भी उन्होंने मेरे लिए यही किताब चुनी तो इसे उनकी विनोद वृत्ति का ही उदाहरण मानना चाहिए। इससे उनकी यह आश्वस्ति भी झलकती है कि ऐसी किताबें ईश्वर का क्या बिगाड़ लेंगी!

पेरियार से हम क्या सीख सकते हैं?


इस देश में भेदभाव और शोषण से भरी परम्पराओं का विरोध करने वाले अनेक विचारक और क्रांतिकारी हुए हैं जिनके बारे में हमें बार-बार पढ़ना और समझना चाहिए। दुर्भाग्य से इस देश के शोषक वर्गों के षड्यंत्र के कारण इन क्रांतिकारियों का जीवन परिचय और समग्र कर्तृत्व छुपाकर रखा जाता है। हमारी अनेकों पीढियां इसी षड्यंत्र में जीती आयीं हैं। किसी देश के उद्भट विचारकों और क्रान्तिकारियों को इस भाँती छुपाकर रखने, या अनुपलब्ध बनाए रखने में ना तो देश का हित है और ना समाज का हित है। हाँ घटिया राजनीति का कोई तात्कालिक हित अवश्य हो सकता है।

ऐसे ही हिंदी पट्टी में अदृशय बना दिए गए एक विचारक और क्रांतिकारी हैं रामास्वामी पेरियार, जो द्रविड़ और दलित आन्दोलनों के सन्दर्भ में याद किये जाते हैं। दलित और द्रविड़ शब्द की युति में बांधकर उनके मौलिक दान को नकारने का या कम करके आंकने का काम आज तक होता आया है। ये एक बहुत पुराना षड्यंत्र है, जो लीक से ज्यादा हटकरचलने वाले क्रांतिकारियों के साथ इस देश में सत्ता और समाज के ठेकेदारों ने हमेशा किया है। यूं तो भगत सिंह और आजाद भी क्रांतिकारी हैं और लीक से थोडा हटकरचलते हैं, वे अपनी क्रान्ति की प्रस्तावनाओं में इस देश की समाज व्यवस्था की पूरी सडांध को बेनकाब नहीं करते हुए क्रान्ति का मार्ग बनाते हैं, इसलिए थोड़े सुरक्षित मालूम पड़ते हैं।

वैज्ञानिकों के अंधविश्वासी आचरण की आलोचना करना क्यों जरूरी है?


वैज्ञानिकों के अंधविश्वासी आचरण की आलोचना करना क्यों जरूरी है? ये हैं 9 कारण, जो आपको भी जानना चाहिए।  

(1) जब हम जनता के अंधविश्वासी आचरण की आलोचना करते हैं तब लोग कोई वैज्ञानिक का नाम लेकर कहते है कि देखो, ये महान वैज्ञानिक भी ऐसा ही करते हैं, जैसा हम करते हैं।

(2) लोग कहते हैं कि वैज्ञानिक भी ईश्वर को मानते हैं। वैज्ञानिक मंदिर भी जाते हैं। पूजा पाठ भी करते हैं। क्या आप इस वैज्ञानिक से ज्यादा ज्ञानी हैं?

(3) लोग ऐसी वाहियात दलील इसलिए कर सकते हैं क्योंकि कुछ वैज्ञानिक अंधविश्वासी होते हैं। वो विज्ञान के साथ वफाई नहीं करते हैं। विज्ञान उनके लिए सिर्फ एक कमाई का जरिया है। ऐसे फर्जी वैज्ञानिकों की हमे कड़ी आलोचना करनी चाहिए।

"हम सब इंसान हैं, हम पर बचपन से ही धर्म का ठप्पा क्यों?"


धर्म की खोज के कई सौ साल बीत गए लेकिन धर्मों के प्रति लोगों का आकर्षण कम नहीं हुआ है। कुछ अपवादस्वरूप विकसित देश जरुर हैं, जहाँ धर्म धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं अथवा ऐसा कहें कि धर्म के प्रति पागलपन में कमी आती जा रही है। उनके लिए ईसाई अथवा हिन्दू-मुस्लिम होना जरुरी नहीं रह गया है। वे बस खुद को इन्सान के रूप में पहचाने जाने की अपील करते हैं। उनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो धर्म और उनकी मान्यताओं को समाज के लिए खतरनाक मानते हैं। वे कहते हैं कि धर्मों द्वारा समाज में कटुता पैदा की जा रही है।

राजनीति में धर्मों का इस्तेमाल और भी घातक है। हिन्दू-मुसलमान आपस में लड़ रहे हैं, मुसलमान-ईसाई से, ईसाई किसी और से और फिर सब एक दुसरे से। इससे समाज में हिंसा पैदा हो रही है। इन्सान-इन्सान में भेदभाव पैदा हो रहा है और हर धार्मिक मतावलंबी अपने धर्म को बेहतर बता रहा है।

नास्तिकों की पहचान को सरकार को क्यों मान्यता देनी चाहिए?



कोलकाता के बेथुन कॉलेज हाल में काफी चर्चित रहा, वह इसलिए क्योंकि वहाँ नए विद्यार्थियों के एडमिशन फॉर्म में अन्य धर्मों के साथ ह्यूमैनिटी का एक नया विकल्प भी भरने के लिए था। हिन्दू, ईस्लाम, ईसाई, सिक्ख, जैन, बौद्ध आदि धर्मों से अलग 'ह्यूमैनिटी' को एडमिशन फॉर्म में रखना वैसे तो काफी अच्छी पहल है। वैसे भी सभी धर्म ह्यूमैनिटी यानि मानवता का दावा करते हैं, ऐसे में किसी को उससे क्या आपत्ति हो सकती है।

लेकिन जिस तरह से मानवता से अलग हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि होने की भारत में हर व्यक्ति को अधिकार है, उसी प्रकार नास्तिक होने का भी है। भारत का संविधान तो हर व्यक्ति को अपने विचार, विश्वास और उपासना आदि की स्वतंत्रता देता है। ऐसे में क्यों नहीं भारत के सभी सरकारी संस्थानों व गैर-सरकारी संस्थानों में जहाँ भी धर्म का कॉलम हैं, वहां ‘नास्तिक’ अथवा ‘कोई धर्म नहीं’ भरने का विकल्प उपलब्ध हो?

ज़िंदगीनामा: एक मामूली लड़के की आत्मकथा

महेंद्र कुमार अपने फेसबुक प्रोफाइल में लिखते हैं, "रिलेशनशिप मुक्त, संतान मुक्त, धर्म मुक्तनास्तिक, स्पष्टवादी, शाकाहारी, बहुआयामी, पागल, देशी।" उनके फेसबुक पोस्ट भी रेडिकल और सामान्य से काफी अलग। ऐसे व्यक्ति की आत्मकथ्य पढ़ने में कुछ अलग तो लग सकता है, जो हमारे सामाजिक नियम कानून व संस्कार से अलग हों, पर कई बातें हमें सोचने को मजबूर करती हैं। जीवन के प्रति उनकी दृष्टि बेशक नया और खोजी की दृष्टि है। आईये पढ़ते हैं, उनकी कहानी उन्ही की जबानी और शुरू करते हैं, उनके सामान्य परिचय से।
                                                                                                                   – संपादक

महेंद्र कुमार की तस्वीर उनके फेसबुक प्रोफाइल से 






नाम- महेंद्र कुमार, पता जोधपुर, राजस्थान, उम्र- 22 वर्ष, शिक्षा- स्नातक, धर्म- नास्तिक/ मानवतावादी, शौक- लेखनसंगीत सुननानये लोगों से मिलना। प्रेरणादायक शख्सियत- संजय दत्तओशोनिक  वुजिकिक तथा पंसदीदा बालीवुड फिल्म- मदर इंडिया।

नास्तिकता की शुरुआत

जब मैं छठी कक्षा में पढता था,  तब वहाँ के हेडमास्टर श्रीमान् रूगाराम जी थे,  वह बहुत तार्किक थे। कक्षा में कभी - कभी ईश्वर,  धर्म अंधविश्वासों तथा ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा होती थी। रूगाराम जी ने ईश्वर के अस्तित्व को लेकर अपने निजी मत रखे थे, फलस्वरूप मैं ईश्वर के अस्तित्व तथा धर्मों की उत्पत्ति को लेकर चिंतन करने लगा। उस समय मेरी जिज्ञासा चरम पर थी, मानव की उत्पत्ति, पृथ्वी पर जीवों का उदभव, ब्रहांड के रहस्यों इत्यादि के सवालों के जवाब चाहिए थे।

साइंस में मैंने डार्विन का सिद्धांत, बिग बैंग थ्योरी, जीवों की उत्पत्ति इत्यादि प्रकरणों को पढना शुरू कर दिया। कुछ वैज्ञानिक तथा दार्शनिकों के ईश्वर पर निजी मत भी पढे। उसके बाद मैं सोशल मीडिया से जुड़ गया,  वहाँ पर मुझे मेरी विचारधारा के लोग मिलने लगे। मैंने भगत सिंह को पढ़ा तथा उन्हीं का  बहुचर्चित लेख "मैं नास्तिक कयों हूँ" पढ़ा तथा स्टीफन हांकिग के ईश्वर के अस्तित्व को नकारने के सिद्धांत भी पढे। 

60 हज़ार रूपये में आप भी बदल सकते हैं, अपनी किस्मत की रेखा

बेटा तुम्हारे हाथों की रेखाएं बता रही है कि तुम्हारी शादी नहीं हो सकती, रोज़गार में बरकत नहीं और परिवार में भी सुख नहीं है।  शहरों में 5 सितारा दुकानों से लेकर नुक्कड़ के फुटपाथ तक हाथ देखने वालों की कमी नहीं है। करोड़ों रूपये का कारोबार हाथों की रेखाओं के दम पर किया जाता है और हिंदुस्तान में यह बीमारी कई सौ सालों से अपनी दुकान जमाये है।

आइये विज्ञान की नज़र से जानते है कि हाथों में बनी ये लकीरे क्यों बनती है और इनकी मानव शरीर में क्या उपयोगिता है।

हस्त रेखाओं को विज्ञान की भाषा में Palmar Flexion Creases कहा जाता है और इनका निर्माण गर्भ में ही भ्रूण के 10 वे सप्ताह में होने लगता है। मुख्य रूप  से यह रेखाएँ अनुवांशिक रूप में भी आकार लेती है और जन्म से ही बच्चों के हाथो में देखी जा सकती है।

एक प्रयोग करें! अपनी हाथों की रेखाओं को अपने माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्यों की रेखाओं से मिलाने  प्रयास करें। आप हैरान होंगे कि कई बार 95% से भी ज्यादा समानता के साथ ये रेखाएँ और उनकी बनावट अन्य सदस्यों के हाथो की रेखाओं से मिलती हैं।

बात यह है कि जिस तरह हमारा रंग, रूप, नैन, नक्श आदि परिवार पर जाते हैं, उसी तरह हाथों की लकीरें भी। यह एक सामान्य शारीरिक घटना है।

जानिए ! क्या है जिद्दु कृष्णमूर्ति का असली चमत्कार?



जिद्दु कृष्णमूर्ति का असली चमत्कार भारतीयों को भारतीयों की भाषा में समझाया नहीं गया है। उनके गहरे मित्र और समर्थकों ने भी अभी तक बहुत ही ईमानदारी से कृष्णमूर्ति का प्रचार करने की कोशिश की है। उन्होंने भारतीय मन की कमजोरियों का लाभ उठाकर कृष्णमूर्ति का प्रचार नहीं किया है। इसीलिये कृष्णमूर्ति को लोग न तो जानते हैं, न समझते हैं।

लेकिन ओशो रजनीश और जग्गी वासुदेव या रविशंकर जैसे लोगों ने भारतीय मन की कमजोरियों का फायदा उठाते हुए खुद को बहुत ही व्यवस्थित ढंग से प्रचारित किया है। इसीलिये न सिर्फ लोग उन्हें जानते हैं बल्कि उनकी पूजा भी करते हैं। इन लोगों ने भारतीयों का कितना हित या अहित किया है ये बात अलग है, इसका हिसाब लगाना हालाँकि बहुत आसान है।

इनके शिष्यों की जिन्दगी में थोड़ा-सा गहराई से झांकिए सब पता चल जाता है। इनके अंधविश्वास, भाग्यवाद और गुरु पर हद दर्जे की निर्भरता (जिसे ये गुरुभक्ति कहते हैं) से साफ़ पता चलता है कि इन गुरुओं ने नुक्सान ही अधिक पहुँचाया है और अभी भी पहुंचा रहे हैं।

आइये कृष्णमूर्ति को भारतीय मन के ढंग से समझते हैं। हालाँकि यह ढंग बिलकुल ही गलत है लेकिन इसके प्रति चेतावनी जाहिर करते हुए मैं ये पोस्ट लिख रहा हूँ। इसका उद्देश्य सिर्फ इतना ही है कि कृष्णमूर्ति को न जानने वाले लोगों को ये पता चल सके कि कृष्णमूर्ति सामान्य बाबाओं से किस तरह भिन्न हैं। कितने इमानदार, बोल्ड और कितने खालिस जमीनी इंसान हैं। यह बताना इसलिए भी जरुरी है कि भारतीय मन चमत्कार में ही भरोसा करता है। इमानदारी यहाँ चमत्कार नहीं है इंसानियत यहाँ चमत्कार नहीं है। जब तक ये न बताया जाए कि किसी ने करोड़ों रुपयों को लात मार दी तब तक लोग त्याग को भी नहीं समझते।

वैज्ञानिक मानवतावाद के कुछ मूल प्रश्न: एक इंटरव्यू

यह लेख काल्पनिक इंटरव्यू के आधार पर तैयार की गई है जिसका मुख्य उद्देश्य अपने साथियों और जनता के बीच वैज्ञानिक मानवतावाद के बारे में सही संदेश को पहुंचाना है। तो पढ़िए और खुद अपने तर्कों व अनुभवों के आधार सही-गलत का निर्णय लीजिये।



प्रश्न: आप किस धर्म को मानते हैं?

उत्तर: हम किसी स्थापित धर्म को नहीं मानते और उनके मतों और सिद्धांतों के मामले में हम निरपेक्ष दृष्टि रखते हैं। हमारे लिए मत पंथ जिनकी बहुसंख्य बातें कटटर और अवैज्ञानिक है, अस्वीकृत है। धर्म का अर्थ अगर चारित्रिक उन्नति, प्रेम का बिना किसी भेदभाव के विस्तार है और धरती के जीवन को सम्पूर्ण रीती सुखी बनाने का प्रयास है तो हमारा कोई भेद नहीं। लेकिन धर्मो का इतिहास और वर्तमान इसके उलट ही है इसलिए तार्किक रूप से वे सभी अयोग्य है।

प्रश्न: तो क्या आप सभी धर्मों के विरोधी हैं?

उत्तर: हम उन समस्त वादों और मान्यताओं का विरोध करते हैं जो कि किसी अलौकिक सत्ता में विश्वास करती हैं और मनुष्य मनुष्य को आपस में किसी भी लेबल के आधार पर बाँटती है।

प्रश्न: अगर ईश्वर नहीं है तो धरती को किसने बनाया यह सारा ब्रह्मांड कौन चला रहा है?

उत्तर: ब्रह्मांड का बनना और चलना एक प्राकृतिक घटना है इसकी उत्पत्ति पर अभी विज्ञान रिसर्च कर रहा है परंतु अब तक प्रचलित थ्योरीज़ में बिग बैंग थ्योरी सर्वाधिक स्वीकृत है तथा उसमे भी समय के साथ अधिक तर्कपूर्ण बातें सामने आ रही है; अतः हम भी इसी अनुसार इसकी व्याख्या करते हैं। क्योंकि अगर इस ब्रह्मांड का बनाने वाला कोई ईश्वर होता तो उसे किसने बनाया यह प्रश्न फिर भी शेष रहता? और अगर जो यह मानते हैं कि उसको किसी ने नहीं बनाया वह अपने आप प्रकट हुआ तो फिर इस हिसाब से ब्रह्मांड को अपने आप प्रकट होने वाला भी माना जा सकता है।

प्रश्न: लेकिन जगत की हर चीज जैसे टेबल कुर्सी आदि सभी का कोई न कोई बनाने वाला होता ही है?

उत्तर: देखो जगत में किसी चीज़ का बनना दो प्रकार से होता है एक तो किसी व्यक्ति द्वारा दूसरा प्राकृतिक घटनाओं के संयोग से। कारपेंटर कुर्सी बनाता है टेबल बनाता है लेकिन एक बार बनने के बाद वह टेबल कुर्सी नित्य बढ़ते घटते नहीं रहते, लेकिन ब्रह्मांड कोई ऐसा नहीं है कि पहली बार जैसा बना अब तक वैसा ही है। वह प्रतिक्षण बढ़ रहा है फैल रहा है। निरंतर परिवर्तनशील है ; जैसे दूध से दही कोई व्यक्ति नहीं बनाता, वह तो दही के जीवाणु की दूध के साथ क्रिया का परिणाम है ऐसे ही विश्व की उत्पत्ति और जीवन भी प्राकृतिक रासायनिक एवं जैविक घटनाओं का परिणाम है।

"आध्यात्मिक धर्म इंसानों को जोड़ता नहीं, बल्कि तोड़ता है"

हमारे देश भारत में धार्मिक बनना सहज है, हम सभी को पैदा होते ही धर्म को घुट्टी की तरह पिलाया जाता है। जबकि नास्तिक बनना इतना सहज नहीं होता है। जब हम शिक्षित होते हैं, अपने मन में उठे सवालों के तार्किक उतर ढूंढते हैं। धीरे-धीरे हमारे भीतर वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास होने लगता है, और तभी सही मायने में हम हेतुवादी या नास्तिक बन पाते हैं।

मैं एक धार्मिक या धर्मभीरु परिवार में जन्मी हूं। बचपन से ही हमारे घर में बारहों महीने हर दिन कुछ न कुछ धार्मिक आडंबर होते हुए देखती रहती थी। पर मेरे मन में हमेशा कुछ न कुछ सवाल उठता था, जैसे कि ये पुरोहित जब घर में आता है, कुछ श्लोक बोल कर  पता नहीं क्या पूजा के नाम पर ढोंग करता है। जबकि उससे उम्र में काफी बड़े मेरे दादा-दादी भी उस पुरोहित के पैर छूते थे और धोते थे। मुझसे इस तरह की मानसिक गुलामी देख कर सहन नहीं होता था। लोग इतना पूजा पाठ क्यों कर रहें है? इससे होता क्या है? क्या हासिल हो जाता है? आदि आदि।

घर में तो हमेशा कलह लगा रहता था। केवल लड़का की चाह में छः लड़कियां हो गयीं, इससे पारिवारिक समस्याएं और बढ़ती गयी। घण्टों पूजा करती हुई मां गुस्से में रहती थी और वहीं से बीच बीच में हमें डांटती भी रहती थी। पूजा करने वालों के मन तो शांत रहना चाहिए न! फिर यह कैसी पूजा है? 

पेरियार द्वारा ईश्वर को पूछे गए वो सवाल, जो हर 'तर्कशील' को जानना चाहिए



आज़ादी से पहले और इसके बाद भी दक्षिण भारतीय राज्यों, खासकर तमिलनाडु में पेरियार का बड़ा ही गहरा असर रहा है। दक्षिण भारतीय लोग उनका बहुत अधिक सम्मान करते हैं। पेरियार के नाम से प्रसिद्द, ई. वी. रामास्वामी का न केवल सांस्कृतिक बल्कि तमिलनाडु के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्यों पर भी असर इतना गहरा है कि चाहे कम्युनिस्ट हों या दलित आन्दोलन से जुड़े लोग, सब उनसे प्रभावित रहे हैं। 

तमिल राष्ट्रभक्त से लेकर नास्तिकों, तर्कवादियों और नारीवाद की ओर झुकाव वाले भी उनका सम्मान करते हैं। उनके विचारों व कार्यों का हवाला देते हैं और उन्हें एक मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं। तर्कवादी, नास्तिक और वंचितों के हित में बोलने व कार्य करने के कारण, उनकी सामाजिक और राजनीतिक ज़िंदगी ने कई उतार चढ़ाव देखे। 

इरोड वेंकट नायकर रामासामी (17 सितम्बर, 1879-24 दिसम्बर, 1973) जिन्हें पेरियार के नाम से अधिक जाना जाता हैं, बीसवीं सदी के तमिलनाडु के एक महत्वपूर्ण और लोकप्रिय राजनेता थे। उनकी उपाधि पेरियार, दरअसल तमिल में सम्मानित व्यक्ति के लिए प्रयोग किया जाता है।

नास्तिकों से हर धर्म-सम्प्रदाय के लोगों को क्यों खतरा रहता है?



नास्तिकों से हर धर्म और सम्प्रदाय के लोगों को खतरा रहता है। वे नहीं चाहते कि कोई पीढ़ी सोचने समझने वाली और तर्क करने वाली पैदा हो। इसके कई कारण हैं। पहला तो सोचने समझने वाले व्यक्ति को कंट्रोल करना असान नहीं होता, वह देर सबेर अपनी दृष्टि दुनिया और समाज के प्रति विकसित कर ही लेता है। उसे गुलाम बनाना आसान नहीं होता। 

वह गलत और संशय प्रतीत होने पर आपसे सवाल पूछ सकता है। आपके विचार से अलग एक विकल्प सुझा सकता है। आप विचार और कार्यों कि आलोचना कर सकता है। आप नहीं सुधरे तो आपका विरोध भी कर सकता है. तो तर्क और सोचने-समझने के बड़े खतरे हैं, उनके लिए, जो चाहते हैं सत्ता उन्हीं के पास रहे। धन और दबंगई उनके पास ही रहे।

ईश्वर पूजा के नाम पर पर्यावरण का 'कचरा' मत करिए ...प्लीज !!



हमारे धर्मों में ईश्वर की पूजा हो, मंदिरों-मस्जिदों की सजावट हो या दरगाह पर चढ़ने वाली चादरें, फूलों का हमसे अटूट सम्बन्ध है। और सिर्फ पूजा ही क्यों, शादियों में, जलसों में, सजावट में हर जगह फूल हमारी जिंदगी से जुड़े ही रहते हैं यहाँ तक की मरने के बाद तस्वीरों पर चढ़ने वाले हार के रूप में भी।

हम फूलों को अपनी भावनाओं से अपनी श्रद्धा से जोड़कर देखते हैं मंदिरों के प्रांगण में फूलों की टोकरियों को लेकर जब हम अपने इष्टदेव पर चढ़ाते हैं, मानो दिल को एक तस्सली होती है कि पूजा ठीक से हुई। लेकिन इस सुन्दर मोड़ के बाद की भयावह कहानी आपमें से कितने लोग जानते हैं

अगर हम पूछें कि आपके फूल चढाने के बाद अगले दिन ये फूल कहाँ जाते हैं, तो आपमें से कई लोग कहेंगे, इन पवित्र फूलों को कचरे के डिब्बे में फेक नहीं सकते; इसलिए इन्हे किसी स्थानीय सरोवर, नदी या कुए में विसर्जित कर दिया जाता है, और मुंबई जैसे शहरों में अतंतः समुद्र में।  चलिए अब आगे की कहानी हम आपको बताते हैं

वैज्ञानिक तथ्य: हवन में एक चम्मच घी से कितना ऑक्सीज़न पैदा होता है?



आजकल देश के धार्मिक जगत में विज्ञान की धूम मची हुई है।  हर कोई प्राचीन धर्मशास्त्रों की पुरानी बातों में नया विज्ञान ढूंढ रहा है, और असल विज्ञान न मिले तो न सही, नक़ल को ही असल समझा कर बेचा जा रहा है। क्या ज्योतिष, क्या वास्तुशास्त्र और क्या ध्यान-योगासन, सभी वैज्ञानिकता का बाना पहन कर नए-नए मैकअप कर मैदान में उतर रहे है। जिन बाबाओं और पीरों ने छठी कक्षा तक भी विज्ञान नहीं पढ़ा है, वे भी खुद को साईंटिस्ट बनाकर खूब जेब काट रहे है। 

वायु प्रदुषण के इस भीषण संकट में एक और दावा सुर्ख़ियों में है, हवन की वैज्ञानिकता का। हज़ारों साल पहले निकले इस वैदिक कर्मकांड को बारिश करवाने से लेकर वायु प्रदुषण दूर करने और जरुरत पड़ने पर एड्स, कैंसर और मधुमेह जैसी गंभीर बीमारियों तक को दूर करने वाला साबित किया जा रहा है। 

हवन की वैज्ञानिकता की बात निकली तो हमारे अंधभक्त भाई-बहन न आगे देख रहे हैं, न पीछे। एक खबर के अनुसार, बीते साल मेरठ में 500 क्विंटल लकड़ियों को हवन में जलाकर एक संगठन ने जबरदस्त वाहवाही लूटी, आखिर पर्यावरण संतुलन का अचूक उपाय जो कर रहे थे।