हम नास्तिक क्यों हैं, क्या सच में आप जानना चाहते हैं?



नास्तिकों या मुक्त बुद्धिवादियों के संबंध में अक्सर यह मान लिया जाता है कि इस प्रकार के लोग ईश्वर विरोधीधर्म, परंपरा विरोधी एवं सभ्यता संस्कृति के दुश्मन होते हैं। जनसामान्य की यह धारणा कई बार और उग्र होकर यह मान लेती है कि नास्तिकता का उद्देश्य ईश्वरधर्म आदि की सत्ता को नकार कर सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में, चाहे जैसा स्वछंद और मनमाना आचरण करना है।

स्वर्ग-नर्क और वहाँ होने वाले हिसाब-किताब को नकार कर नास्तिक धरती पर स्वच्छंद, वासना भोग को बढ़ाना चाहते हैं, यह धारणा वास्तव में बहुत शोचनीय और दुखद है। आज जहाँ दुनियाभर की पुस्तकें, दर्शन और व्यक्तियों के विचार आपकी उंगली के इशारे से आपके लिए उपलब्ध हो सकते हैं, ऐसी स्थिति में भी नास्तिकों या मुक्त बुद्धिवादियों के बारे में ऊपर कही गई बातों को सुन-सुना कर मान लेना संसार के उन महानतम विचारकों के साथ अन्याय है जिन्होंने नास्तिक रहने के बाद भी इस धरती पर मानव समाज का अन्यतम उपकार किया।

कई बार कुछ नास्तिक मित्र भी ऐसे मिल जाते हैं जो केवल धर्मों, ईश्वर और सामाजिक परंपराओं का मजाक उड़ाना और उल्टे-सीधे तर्कों से जन भावनाओं को आहत करने को ही अपने जीवन लक्ष्य मान बैठते हैं। उन्हें देखकर केवल यही कहा जा सकता है कि वह विध्वंसात्मक नास्तिक हैं, सर्जनात्मक नहीं। सृजनात्मक नास्तिकता विध्वंस और नकार के एक कदम और आगे की बात करती है। इसलिए यहां मैं सभी के लिए सृजनात्मक नास्तिकता के बारे में कुछ रूपरेखा स्पष्ट करना चाहूंगा।

सामान्य अर्थों में आस्तिक शब्द का अर्थ ‘अस्ति’ अर्थात जो हैसे किया जाता है और नास्तिक ‘न-अस्ति’ अर्थात जो नहीं हैसे जोड़ा गया हैं। मोटे तौर पर आस्तिक उन्हें कहा गया जो इस विश्व ब्रह्मांड में एक अदृश्य अलौकिक सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं। उनके हिसाब से विश्व की उत्पत्ति, पृथ्वी पर जीवन का पैदा होना, धर्म शास्त्रों का प्रकटीकरण एक शक्ति विशेष जिसे वह यहोवा, अहुर-मजदा, ईश्वर, गॉड, अल्लाह आदि नामों से पुकारते हैं, की इच्छा अनुसार हुआ है।

इस ईश्वरीय इच्छा के पीछे उनके अलग-अलग दर्शन है, कई जगह ऐसा करने के पीछे उस अलौकिक शक्ति का उद्देश्य था- सारा संसार उसकी महिमा को जाने, उसकी भक्ति करें, उसकी प्रशंसा हो। कुछ का कहना है संसार रूपी परीक्षा स्थल में आकर स्वयं को तपस्या द्वारा उन्नत बनाकर ईश्वर की प्राप्ति करना और अनंत मुक्ति, मोक्ष, निर्वाण प्राप्त करना। बहुत से आस्तिक इस पूरे घटना क्रम को उस परमेश्वर की लीला मात्र मानते हैं, यह सब उसका रचाया खेल है और हम संसार रूपी खेल के मैदान में अच्छा बुरा जैसा भी खेलते हैं, मैदान के बाहर अंपायर की भांति ईश्वर भी हमें पाप पुण्य और रूपी पॉइंट देता रहता है। इसी के आधार पर हम अगले जन्म यानी अगले खेल के लिए प्रमोशन या डिमोशन पाते हैं।

आस्तिक अपने विश्वास के अनुसार इन खेल के नियमों को अपनाया करता है जिसे उनकी भाषा में ईश्वरीय विधान या धर्मशास्त्र कहा जाता है। यह नियम उस ईश्वरीय सत्ता द्वारा लगभग प्रत्येक आस्तिक समुदाय को दिए गए होते हैं। अमूमन यह नियम इकट्ठे होकर एक बड़ी धर्म पुस्तक का आकार धारण कर लेते हैं जिन्हें वेद, तौरात, ज़बूर, तालमुद, बाइबल, कुरान, धम्मपद, जेंद अवेस्ता.. और भी अनेकों नाम दिए गए हैं। प्रत्येक आस्तिक समुदाय स्वयं की मत-पुस्तिका को परम सत्य, अपरिवर्तनीय, अपौरुषेय और अपने अलावा भी अन्य समुदायों के लिए पालनीय मानता है।

जिस तरह खेल के निर्धारित नियमों में छेड़खानी करने या फिर उनका पालन न करने पर खिलाड़ी को खेल में बने रहने का कोई अधिकार नहीं होता, उसी प्रकार यह आस्तिक समुदाय भी अपने समुदाय के लोगों पर गहरी नजर रखते हैं। अगर कोई व्यक्ति इन ईश्वरीय नियमों का उल्लंघन करता पाया गया तो या तो उसे समुदाय में बने रहने का कोई अधिकार नहीं या फिर इस दुनिया में रहने का। इतिहास हमें बताता है कि सामान्य खेल के विपरीत, आस्तिकता के इस खेल में मैदान से बाहर निकालने की अपेक्षा दुनिया से बाहर निकाल दिया जाना अधिक व्यापक और प्रशंसनीय माना गया है।

आज भी कुछ संप्रदाय ऐसे हैं, जहां इन धर्म पुस्तिकाओं या उसके निर्माता पर सवाल उठाने या नियमों को बदलने की कोशिश करने का अर्थ सिवाय अपनी मौत को आमंत्रित करने के और कुछ नहीं है। कुछ जगहों पर जहां मानवाधिकारों के डर से हत्या सरल नहीं है वहाँ भी अपमानों एवं बदनामियों, तिरस्कार और छुपी हुई सजाओं की ऐसी झड़ी लगा दी जाती है जिसकी तुलना तिल-तिलकर के लिए आई मौत से जरूर की जा सकती है।

आस्तिक समुदाय में एक और विशेष बात है कि नियम पुस्तिकाओं को ईश्वर ने स्वयं आकर पूरे समुदाय को नहीं दिया। लगभग हर उदाहरण में ईश्वर ने खेल के नियमों की जानकारी एकाध व्यक्ति को अकेले में दी या कुछ व्यक्ति विशेष के हृदय में इन ईश्वरीय बातों को प्रकट किया गया।

पश्चिम के अब्राहिमइक धर्मों में सनाई पर्वत पर मूसा को अकेले में ईश्वर ने पत्थर पर 10 नियम लिख कर दिए। ईसा को भी उनके स्वर्गस्थ पिता से पवित्र आत्मा द्वारा उपदेश प्राप्त होते रहे और उन ईश्वरीय वचनों का संकलन बाद में बाइबल के रूप में सामने आया। इस्लाम जोकि इन अब्राहमी धर्मों में सबसे शक्तिशाली और आखरी माना गया, उसके पैगंबर मोहम्मद को अलग-अलग मौकों पर अल्लाह के भेजे संदेशों पर आधारित कहा गया। पहले की तरह यहां भी इन संदेशो का आना लगभग उस समय शुरू हुआ जब पैगंबर मोहम्मद हीरा नामक पहाड़ी की गुफा में अकेले ईश्वर चिंतन में लीन थे। बाद में उन्होंने अपने परिवारों और लोगों को बताया मुझे दुनिया के लिए पैगंबर बनाकर भेजा है और जिब्राइल नाम का एक फरिश्ता मुझ तक अल्लाह के यह संदेश लेकर पहुंचता है।

इन संदेशों को बाद में एकत्रित करके कुरान का नाम दिया गया, जोकि धर्मों की दुनिया की सबसे ज्यादा परिपूर्ण, त्रुटिरहित और आखरी किताब मानी गई। इसके उलट हमारे देश में अति प्राचीन अंगिरा, अग्नि, वायु आदि ऋषियों को उनकी एकांत साधना तपस्या के फलस्वरुप कुछ तथ्यों का साक्षात्कार हुआ जिन का संकलन वेद कहा गया और जिसे ईश्वरीय वाणी, देववाणी कहा गया।

माना गया कि इन शास्त्रों और किताबों में लिखे सिद्धांत काल की सीमा से बाहर और अमर हैं। एक विशेष बात देखने में आती है कि दुनिया के सभी धर्म और उनके धर्मशास्त्र पुरुषों को ही प्रदान किए थे। नर नारी की समानता का दावा करने वाले आस्तिक अनुयाई अगर पैगंबरों और नारियों का अनुपात देखें, तो ज्ञात होगा कि इन धर्मों के आरंभ में ही असमानता का बीज बोया हुआ था। कहीं स्त्री को नर्क का द्वार कहा गया, तो कहीं आत्मा से रहित, और कहीं शैतान से बहकी निर्बुद्धि नारी। बहुत से शास्त्रों में कहा गया कि स्त्री को मोक्ष पाने का अधिकार ही नहीं है।

खैर इन सब तथ्यों की पड़ताल को छोड़कर मूल विषय पर लौटते हैं। दुनिया का सबसे पुराने से पुराना धर्म है हिंदू.. अथवा यहूदी धर्म से लेकर लगभग 500 साल पहले पैदा हुए सिख धर्म तक देखें, तो जिस तरह आस्तिकों ने सारे संसार को एक सूत्र में बांधना चाहा, गरीबी और वर्ग-संघर्ष को समाप्त करना चाहा, भूख, भय, भ्रष्टाचार को मिटाना चाहा, वैसा पिछले 5000 साल के इतिहास में कुछ हुआ नहीं। उल्टा अपने-अपने समुदायों की मान्यताओं को ही एकमात्र अंतिम सत्य और सर्व लोकोपयोगी मानने के दुराग्रह ने इन आस्तिकों के बीच एक नए वर्ग को जन्म दिया जिन्हें धर्म रक्षक, धर्म सैनिक या जिहादी कहा गया।

ये आस्तिक समुदाय के वे चुने हुए लोग थे जिन्हें किसी भी कीमत पर अपने धर्म के तत्व को दुनिया का सत्य बनाना था। बड़े बड़े युद्ध धर्म-युद्ध बन गए और लड़ कर मरने वाले स्वर्ग के अधिकारी गाजी, वीरगति प्राप्त शूरवीर और शहीद। अपने धर्म की रक्षा और विस्तार का एकमात्र तरीका काम आया तो वह था परधर्मी को अधर्मी या काफिर मानकर उसका समूल नाश। इस नए वर्गों को उनकी सद्गति का विश्वास और वादा करने वाले पुरोहितों का वर्ग पहले से ही जन्म ले चुका था जिसका स्थान इस कहानी में चौथे नंबर पर था।

इसमें सबसे पहले ईश्वर, दूसरे पैगंबर या अवतार, तीसरा धर्मस्थान और चौथा उसका पुरोहित, पादरी या इमामों का वर्ग रहा। धर्म के मूल में अनजाने अदर्शनीय तत्वों पर, उसकी वाणियों और संदेशों पर भरोसा करना सिखाया गया और फिर चलते-चलते धर्म का यही मूल तत्व दूसरी अनजानी अंधेरी ताकतों में भी ढलता चला गया, जहाँ देवीय ताकत के सिक्के का उल्टा पहलू था- शैतानी ताकत।

शैतानी ताकत का काम इंसानों को ईश्वर, धर्म और उसकी धार्मिक संस्था के विरुद्ध भड़काना था। शैतान और कुछ नहीं तो कम से कम इतना ताकतवर तो था ही ईश्वर के लाख समझाने के बावजूद इंसान उसकी बातों में आ ही गया और अब तक उस नाफरमानी का फल भोग रहा है।

लेकिन एक पुराना बाप जिस तरह अपने बेटे को कुसंग से बचाकर किसी तरह भी वापस अच्छा इंसान बनाने की जी-तोड़ कोशिश करता है और उसके लिए साम-दाम-दंड-भेद चाहे जिस का भी सहारा लेता है, उसी प्रकार शैतान के जोरदार प्रहारों से बौखलाया ईश्वरीय-तंत्र आज तक अपने भटके और बहके हुए बच्चों या प्रजाजनों को समेटकर अपनी ओर बुलाने की कोशिश करता रहता है।

लेकिन फिर भी कुछ नाफरमान उसकी मुट्ठी से छूट-छूट कर निकल ही भागते हैं। ये लोग ही शैतान प्रेरित और नास्तिक करार दिए गए हैं। अब आप समझ चुके होंगे कि नास्तिकता कोई 21वीं सदी का नया शगूफा नहीं है, बल्कि दुनिया में इंसानों के बीच जबसे आस्तिकों की पैदाइश हुई उसी के साथ-साथ नास्तिकों ने भी जन्म लिया।

यह लोग अपने दिमाग ऊपर कुछ ज्यादा ही भरोसा किया करते थे, दुनिया में घट रही अपरिभाषित घटनाओं पर आश्चर्य इन्हें भी होता था लेकिन उसका उत्तर खोजने के लिए वह धर्म-संस्था और शास्त्रों की शरण में जाने की बजाए, अपना दिमाग को चलाना ज्यादा पसंद करते थे।

कभी अचानक जब सूखे जंगलों में आग लग जाया करती थी, तो आस्तिक समुदाय उसे ईश्वर का गुस्सा मान लिया करते थे। लेकिन नास्तिक इस प्राकृतिक घटना को, गर्मी और रगड़ को एक साथ रखकर उसका रहस्य खोजा करते थे। मजे की बात यह रही कि दुनिया की प्राचीन से प्राचीन धर्म-शास्त्र में भी ईश्वर ने पत्थरों को रगड़कर चिंगारी प्रकट करने का नुस्खा नहीं समझाया। लकड़ी और पत्थरों की चार-दीवारों और छत को खड़ा कर खुद को गर्मी और मार डालने वाली सर्दी से बचाने के गुण इंसान को किसी धर्म-शास्त्र में नहीं सिखाए, और न ही अपने बचाव के लिए जानवरों की खालों को सी कर अपनी पोशाक बनाना सिखाया।

किसी प्रमुख धर्म-शास्त्र में मानव को विभिन्न तरकारियों और जानवरों के मांस को स्वादिष्ट बनाने की व्यंजन विधियों का कोई वर्णन नहीं है। बारिश से बचने के लिए छाता बनाना सिखाना, धर्म-शास्त्र के स्कोप से बाहर ही रहा। यह सब हमारे पूर्वजों ने अपने सहज ज्ञान से सीखा एवं घटनाओं की अपनी बुद्धि से व्याख्या करके जाना। पहली बार जब हमारे किसी पूर्वज ने दो चकमक पत्थरों को झटका कर आग पैदा की होगी, तो आपको क्या लगता है वह किस और भागा होगा? किसी मंदिर या मस्जिद में ईश्वर का दर्शन कर उसको धन्यवाद करने या अपने गुफा और कबीले के लोगों को यह खुशखबरी बताने?

इस तरह मानव का सहज ज्ञान और अपने आसपास हो रही घटनाओं के पीछे कार्य-कारण ढूंढते हुए मनुष्य का सहज बुद्धिवाद विकसित होता गया। कांटा चुभने पर दर्द और गले मिलने पर प्यार का अनुभव आत्मा नहीं, मस्तिष्क करता है। दुख में शरीर का ढीला पड़ना और आंखों से आंसू बहना, खुशी में चौड़ी मुस्कान के साथ चहकता ऊर्जावान शरीर, मन मस्तिष्क के प्रति संवेदना का ही परिणाम है। यह बात किसी धर्मशास्त्र और ईश्वर के उपदेश के बिना भी उतनी ही सत्य थी है और रहेगी।

जन्मजात बीमारियां, अपंगता, गरीबी, मानसिक रोग आदि के कारण आस्तिक समुदाय न खोज पाया। उसने उसे ईश्वरीय इच्छा, कर्मफल के सिद्धांत से बांध दिया, लेकिन नास्तिक बुद्धिवादी इन घटनाओं के पीछे भी भौतिक और सामाजिक कारणों की खोज करते रहे। फिर बदलते जमाने के साथ प्रयोगशालाएं खुली और यंत्र बने। हमारा सामाजिक परिवेश और सिद्धांतों की कड़ी परीक्षाएं शुरू हुई। पहली बार मनुष्य को समझ में आया कि उसके द्वारा खाए जाने वाले भोजन से ही उसके शरीर के पोषण का संबंध है। असंतुलित और ख़राब भोजन रोग लाता था और संतुलित एवं पौष्टिक आहार तंदुरुस्ती। समस्याओं को ईश्वर के गले से उतारकर प्रयोगशाला की टेबल पर रखने का काम भी ईश्वर आज्ञा से नहीं, बल्कि बुद्धिवादी तबके की एक शाखा ने ही किया जिसे आज हम विज्ञान कहते हैं।

इसी विज्ञान ने भुखमरी और गरीबी के सवाल पर सोचना शुरु किया और पहली बार अर्थशास्त्र का जन्म हुआ। इस अर्थशास्त्र में गरीबी और आर्थिक विषमता को ईश्वर की दया या दंड की कहानियों से तोड़कर समाज के मैदान में फेंक दिया। धन के लोभी-लालची और शोषण-युक्त संपदा का आयोजन करने वाले पूंजीपति कहलाये और गरीबी पहली बार संपदा के असमान वितरण, पूंजीवादी मानसिकता, अकर्मण्यता, संघर्षहीनता के साथ संबंधित हुई।

पहली बार गरीबों को इन सब के खिलाफ थोड़ा-सा ही सही कुछ तो करने का मौका मिला, अन्यथा ईश्वर के पहले और किस्मत की लकीरों के आगे जाने की हिम्मत सैकड़ों बरस तक खुदा की नाफरमानी ही समझी जाती रही। आस्तिकों ने गरीबों की सांत्वना में बड़े कसीदे कहे। किसी ने उन्हें दरिद्रनारायण कहा तो किसी ने ईश्वर से राज्य में धनवानों के प्रवेश को असंभव कहा। किसी ने राम भजन और फकीरी के सुख को अमीरी से बढ़कर मान लिया। गरीब सुनते रहे और यहां नहीं, तो मरने के बाद ही सही रोटी, कपड़ा और मकान का ख्वाब स्वर्ग के पर्दे पर टकटकी लगाकर देखते रहे।

जब तक दुनिया दूर थी आवागमन, व्यापार और संचार कठिन था, आस्तिकों की मौज रही। मैं और मेरा का भाव चलता रहा, परंतु विज्ञान को जैसे शैतान का सहारा मिल चुका था। उस समय का इंसान पानी में लकड़ी के लड़कों को तैरता देख चुका था। फिर कुछ साहसी लोगों ने नाव बनाई और अलग-अलग देशों के बीच व्यापार, भ्रमण और आवागमन शुरू हुआ। लेकिन जब दो अलग-अलग विचारों वाले आस्तिक आपस में टकराए तो मामला बिगड़ा।

लोग अपने साथ-साथ अपने दिमागों में भरे अनोखे सिद्धांत, तौर-तरीके और दर्शन को भी यहां वहां पहुंचाने लगे। दुनियाभर के आस्तिकों में एक बार फिर अस्तित्व के लिए जद्दोजहद शुरू हो गई। धर्मों के घालमेल से बचने का नया उपाय ढूंढा गया विवाह संस्था को धर्मों की चारदीवारियों में बांधने का। समान विश्वास, और आचार-व्यवहार के लोगों के बीच विवाह को सीमित कर देने के पीछे दुसरे धार्मिक विचार, व्यवहार और परंपरा से खुद को बचाने का और रक्त शुद्धि बरकरार रखने का छद्म उद्देश्य छुपा हुआ था।

लेकिन इस बार जीत आस्तिकों के हाथ से रेत की तरह फिसलती जा रही थी। विज्ञान ने किताबें, छापाखाना, चलचित्रों, वाद्ययंत्रों, उड़न-जहाजों, द्रुत जलयानों, तीव्र वाहनों का तोहफा इंसान को देना शुरू कर दिया था। सदियों से छुपाकर पहरे बनाकर संदूकों में रखा गया ज्ञान एक मात्र पवित्र प्रति नहीं रह गई थी जिसकी व्याख्या का एकाधिकार पुरोहित वर्ग के पास ही सुरक्षित रखा हो। छापाखाना ने उनकी लाखों प्रतियां बना कर सराय और बाजारों में बिकने के लिए सजा दिया- उसे जो चाहे खरीदे पढ़े और कहे।

न जात, न धर्म की कोई पूछताछ, इस तरह समस्त स्थापित विश्वासों और तथ्यों को तर्क एवं विश्वास की चुनौतियां मिलने लगी। पहले-पहले अनपेक्षित प्रहार से बचने की कोशिश में सभी रुढ़िवादी धर्मो ने की। कहीं वैज्ञानिकों को धर्म के विरुद्ध सिद्धांत कहने पर जिंदा जलाया गया, तो कई दीन का दुश्मन कहकर हलाल किया गया, परंतु सवाल तो फिर भी उठते ही गए। धर्म की दुकानों में लोग लगातार कम होते जा रहे थे, पण्डे पुजारियों और पोपों के बच्चे खुद उनके पूर्वजों पर संदेह करने लगे थे।

तब आस्तिकों ने नया तरीका ढूंढा अपने भेड़ियों को भेड़ों की खाल पहनाकर उनके ही झुंड में रख देने का तरीका। अचानक हर धर्म खुद के सिद्धांतों की व्याख्या विज्ञान के आधार पर करने लगा। धर्म-विज्ञान, वैज्ञानिक अध्यात्मवाद, वैज्ञानिक-धर्म जैसे शब्दों की बाढ़ आ गई। दावे पर दावे होने लगे कि हमारे ही धर्मशास्त्र, धर्म-सिद्धांतों में दुनिया भर का विज्ञान भरा पड़ा है। इससे अधिक विज्ञानसम्मत धर्म कोई भी नहीं है। जिन्होंने भौतिकी और रसायन विज्ञान का कवर पृष्ठ भी नहीं पढ़ा था, वह भी जाति-व्यवस्था, वर्णाश्रम, छूत-अछूत, नजर दोष, भूत-प्रेत, ग्रह ज्योतिष आदि को विज्ञान की बैसाखियों के सहारे फिर से चलाने की कोशिश करने लगे।

लेकिन ये लोग फिर भी संसार की तकलीफों का कारण, मनुष्य का ईश्वर को भूलकर वैज्ञानिक होना, तर्क करना और धर्म शास्त्रों की आज्ञा का पालन न करने को ही मानते रहे। विज्ञान और बुद्धिमत्तापूर्ण समाज ने भी विश्व को सैंकड़ों उपहार और अन्वेषण दिए। लेकिन किसी को भी प्रमाणित करने के लिए उन्होंने धर्मशास्त्र का सहारा नहीं लिया। विज्ञान ने यह दावा कभी नहीं किया कि हमारे द्वारा खोजा गया नियम इसलिए सत्य और सर्वमान्य है क्योंकि फलाने धर्मशास्त्र ने अथवा अमुक ऋषि-मुनियों पैगंबर ने इसकी अनुमोदना की है।

अपने प्रयोगों की सैकड़ों सफलता-असफलता के बावजूद विज्ञान धर्मनिरपेक्ष, निष्पक्ष और तर्कसंगत बना रहा। उसने अपने परिणामों को अंतिम सत्य नहीं माना और न ही अपनी उपलब्धियों को किसी वर्ग-विशेष तक सीमित रखा। कभी-कभी हम विचार करते हैं कि अगर ट्रेन का आविष्कार किसी वैज्ञानिक की वजह है, चातुर्वर्ण्य पर घनघोर विश्वास रखने वाले पंडित ने किया होता, तो क्या उस ट्रेन में शूद्रों, अति-शुद्रो अथवा वंचितों के लिए कोई स्थान होता? और अगर होता तो क्या उसकी सीटों की ऊंचाई भी ब्राह्मणों के कोच के बराबर होती या कि  खचाखच भरी ट्रेन में कोई शुद्र किसी उच्च जाति के आदमी की नाक में नाक डालें अपनी सांसे इधर-उधर कर पाता?

भला हो उस विज्ञान का जिसने अपनी आंखों को इस तरह से मैला नहीं होने दिया। रेडियम की खोज करने वाले क्यूरी दंपत्ति ने अपनी अगर मेहनत और परिश्रम के दम पर जब रेडियम तत्व की खोज कर ली, तो सरकारों और राजनेताओं के भारी धन-संपत्ति के प्रलोभनों के बावजूद उसका फार्मूला मानव समाज की भलाई के लिए अगली सुबह के समाचार पत्रों में निशुल्क छाप कर दिया, ताकि विश्वभर में ही स्कूल से लाभ उठाया जा सके। क्या पियरे क्यूरी और मेरी क्यूरी ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को अपनी आगे आने वाली पीढ़ियों के उज्जवल भविष्य के लिए तथा उस अपार धन संपत्ति को इसलिए छोड़ दिया कि उस रात उन्हें सनाई पर्वत की जगह उनकी प्रयोगशाला में खुदाई संदेश मिला था? नहीं..न!

उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह संकीर्ण धर्म-संप्रदायों की सीमा से ऊपर उठकर केवल और केवल एक मनुष्य के रूप में खुद को देख सके। इसलिए अगर आस्तिकता का अर्थ किसी अदृश्य शक्ति में विश्वास, उसकी धर्म-किताबों को अंतिम सत्य मानकर उनका पालन करना, मनुष्य-मनुष्य को बांटकर रखने वाली खाई या अनदेखे अनजान विचारों की बलिवेदी पर भौतिक जगत की बलि देना है, तो हम ऐसी आस्तिकता का विरोध करते हैं। और स्वयं को नास्तिकता के पक्ष में खड़ा करते हैं।

जो मित्र सोचते हैं नास्तिकता, अनैतिकता को जन्म देगी वह भयंकर भूल में है। आस्तिकों की नैतिकता, नास्तिकों की अनैतिकता से ज्यादा खतरनाक है; इतिहास इस बात को साबित कर चुका है। एक नास्तिक होने का अर्थ सिर्फ यही नहीं है कि आप स्थापित ईश्वरवाद, भाग्यवाद, नियतिवाद, आत्मावाद, जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद और कट्टर राष्ट्रवाद में यकीन नहीं रखते, बल्कि इससे आगे नास्तिकों की एक और बड़ी जिम्मेदारी बनती है कि वह दूसरे मानवों और जीवों की प्रसन्नता और सुख के लिए भी काम करें। ऐसा इसलिए नहीं कि ऐसा करने का आदेश ईश्वर ने दिया है या ऐसा करने से उन्हें जन्नत का टिकट मिलेगा अथवा ईश्वर की बैंक में पाप-पुण्य के उनके खाते से पाप कम और पुण्य अधिक जमा होगा। नहीं! नास्तिक अपनी नैतिकता के लिए इनमें से कोई बहाने नहीं खोजता।

नैतिकता में उसका विश्वास ऐतिहासिक घटनाओं, उसके परिणामों तथा तात्कालिक परिस्थितियों में समाज के पैदा हो रहे सुख दुख से जन्म लेता है। इसे थोड़ा समझिए! आज से कुछ दशकों पहले तक जब हमारे महानगरों या शहरों में ट्रैफिक सिग्नल नहीं थे, चौराहों पर ट्रैफिक जाम होना, गाड़ियों का अनियंत्रित होकर टकराना आम समस्या थी, जिसे दूर करने का उपाय किसी धर्म-शास्त्र में नहीं लिखा था, न किसी देवदूत या किसी पैगंबर ने बताया था। लेकिन मानव के तार्किक मस्तिष्क ने इसका हल खोजा।

विभिन्न देशों ने अपने यातायात को नियंत्रित करने के लिए कुछ नियम बनाए, चौराहों पर ट्रैफिक सिग्नल लगाए। लाल बत्ती पर रुकना और हरी का इंतजार करना, सड़क पर हमेशा एक और चलना, एकांगी मार्गों (वन-वे) में उलटी दिशा से न घुसना आदि कुछ ऐसे नियम थे जिन्हें देश काल और परिस्थिति के चलते बनाया गया और आज यह नियम समाज में कुछ इस तरह रच बस गए हैं कि उन्हें तोड़ने वालों को जनता के क्रोध का भी पात्र बनना पड़ता है।

आप भारत में सड़क पर दाहिने ओर इसलिए नहीं चलते हैं। क्या यह बात आपको वेदों उपनिषदों अथवा गीता में पढ़ाई गई है? अथवा इस नियम का पालन आप इसलिए करते हैं कि उसका उल्लंघन करना आपको भी खतरे में डाल सकता है और दूसरों को भी नुकसान पहुंचा सकता है। इसी प्रकार किसी दूसरे व्यक्ति के मोबाइल में ताक-झांक करना, किसी धर्म-शास्त्र का उपदेश नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अध्ययन और परिणामों को देख कर अपना सहज नैतिक ज्ञान ही है।

आइए कुछ और नियमों को लेते हैं!

झूठ मत बोलो, चोरी मत करो, हत्या मत करो, दूसरों की धन संपत्ति मत हड़पो, कटु वचन मत बोलो, दूसरों की मदद करो, लोगों के काम आओ, भूखे को भोजन और प्यासे को पानी दो, लोगों के अभावों को दूर करो क्या यह कुछ ऐसे दुर्लभ सिद्धांत थे जो सिवाय ईश्वर और धर्म के उपदेश के किसी को समझ ना आ सके?

क्या आपने किसी घायल जानवर के घाव को चाटते हुए किसी दूसरे जानवर को देखा है? क्या आपने किसी मादा जानवर को शिकार का टुकड़ा अपने मुंह में पकड़े पहले लाकर अपने कमजोर बच्चों को खिलाते देखा है? मधुमक्खियों के उन हजारों मक्खियों के समूह को आप कैसे देखते हैं जिसमें रानी मक्खी का कार्य केवल अंडे देना है और बाकी का कार्य अपने छत्ते के लिए आवश्यक भोजन-पानी और सुरक्षा जुटाना है?

मनुष्य का छोटा शिशु भी 2 वर्ष का होते-होते अपने मां-बाप को देखकर आत्मीयता की चीख-पुकार मचाने लगता है, परायों से बचना और अपनों को दौड़कर गले लगा लेना उसे कौनसे पुरोहित पादरी ने सिखाया होता है?

क्या भाँति-भाँति के मत-मतांतर धार्मिक-विधियों और लंबे-लंबे अनुष्ठानों के बाद ही मनुष्य सीख पाएगा कि चोरी नहीं करना चाहिए, झूठ बोलना ठीक नहीं, दूसरों की संपदा छीनना गलत है ?

क्या यह बात नैतिक ज्ञान की सीमाओं में नहीं सिखाई जा सकती। किसी व्यक्ति को अगर उसके भयंकर क्रोध की अवस्था में अपने ही शरीर में पैदा हुए भयंकर विषैले हार्मोन और ग्रंथियों के बारे में वैज्ञानिक रीति से बताया जाए और दिखाया जाये कि किस तरह दूसरों पर किया गया क्रोध पहले उसके ही शरीर, मन और मस्तिष्क पर प्राणघातक हमले करता है, तो क्या विज्ञान और 3D तकनीक से बना हुआ यह वीडियो उसे इस बारे में नए सिरे से सोचने पर मजबूर नहीं करेगा?

अन्य बुराइयों के संदर्भ में भी क्या इस प्रकार के प्रयोग करना संभव नहीं?

नास्तिक अपनी नैतिकता को ईश्वरीय भय या पुरस्कार के तौर पर नहीं देखता। वह तो उसे समाज में सुखपूर्वक निश्चिंत और मिल-जुलकर जीने के एक आवश्यक घटक के रूप में जानता और पालन करता है। लेकिन मान्यता का मूल आधार बदलते ही एक भारी भेद पैदा हो जाता है, क्योंकि तब आपको न ईश्वर की जरूरत रहती है और न उसकी धर्म-संस्था की और न ही उसके सनातन ग्रंथों की और न उनका तोड़-मरोड़कर प्रतिपादन करने वाले पाखंडियों की।

तब आपका धर्म समाज और मानवता की भलाई के लिए होता है, न कि पुण्य कमाने, स्वर्ग जाने या मोक्ष प्राप्ति के लिए। बस इसी बात को लेकर हमारा विरोध है और हम इसी बात को अच्छी तरह समझ चुके हैं कि जब तक आप अपने धर्म के बीच अपनी मान्यताओं की शेखी बघारते हैं तब तक कोई खास दिक्कत नहीं होती उल्टा हो सकता है कि आपको अधिक महात्मा और संत मानकर आपका सम्मान भी हो जाए। लेकिन जब यही मान्यताएं आपके सिर चढ़कर बोलने लगती है और आप का अहंकार अन्य धर्मों को अपने पैरों तले रौंदने की अनुमति दे देता है, तब आप मानवता के रक्षक नहीं भक्षक हो जाते हो।

हम ऐसा हरगिज़ नहीं मानते कि धर्म, धर्म पुस्तकों और मान्यताओं ने मानव समाज का कोई भला नहीं किया। बल्कि हमारा तो पूरा विश्वास है कि एक लंबे समय तक इन धार्मिक स्थलों विचारों और कहानियों ने मानव को दानव होने से बचाए रखा। मानव समाज के कुछ बेशकीमती मोती जैसे राम, मोहम्मद, बुद्ध, लाओत्सू, कृष्ण, कबीर भी इन्ही धर्म संस्थाओं की देन हैं, लेकिन बदलती हुई परिस्थितियों और सिमटी हुई दुनिया में मानव अपनी रूढ़ियों परंपराओं और मान्यताओं को अब अपनी छाती पर नहीं ढ़ो सकता।

सब चीजों की व्याख्या करने वाला उन्हें साबित करने वाला विज्ञान पहले तक अविकसित या दुर्लभ था, लेकिन अब हमें भूकंप, ज्वालामुखी, सुनामी या बिजली गिरने की व्याख्या करने के लिए धर्म शास्त्रों को नहीं विज्ञान के ग्रंथों को पलटना होगा। नागरिकों को अपने सामने मानवता और उसकी समान रूप से समृद्धि का आदर्श रखना होगा। उसके भी अपने रोल मॉडल होंगे, लेकिन वह ईश्वर और धर्म के नाम पर डराने वाले नहीं बल्कि इंसानियत के नाम पर प्रेम जगाने वाले होंगे। उसके पास ईश्वर के भजन नहीं पर इंसानियत के तराने होंगे। उसके भी तीज-त्योहार होंगे पर मानव मानव को बांटने वाले नहीं, धरती को जोड़ने वाले, संभालने वाले।

हम नास्तिक हो सकते हैं क्योंकि यह हक हमें प्रकृति ने, हमारे तार्किक मस्तिष्क ने और विश्व के नैतिक मूल्यों ने दिया है, लेकिन नास्तिक होना अनैतिक होना नहीं, क्योंकि यह अधिकार हमें मानवता ने नहीं दिया।

प्रोफेसर (डॉ.) ऋषि आचार्य

लेखक एक प्राचार्य के रूप में एक महाविद्यालय में कार्यरत हैं। साथ ही वे 'साइंटिफिक ह्युमैनिज्म इंडिया' के नाम से एक फेसबुक पेज भी चलाते हैं। उनकी अब तक तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं और अपने सामाजिक और तर्कशील विचारों के लिए वे युवाओं के बीच खासे लोकप्रिय हैं।

तस्वीर प्रतीकात्मक DAILY EXPRESS से साभार।

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