"हम सब इंसान हैं, हम पर बचपन से ही धर्म का ठप्पा क्यों?"


धर्म की खोज के कई सौ साल बीत गए लेकिन धर्मों के प्रति लोगों का आकर्षण कम नहीं हुआ है। कुछ अपवादस्वरूप विकसित देश जरुर हैं, जहाँ धर्म धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं अथवा ऐसा कहें कि धर्म के प्रति पागलपन में कमी आती जा रही है। उनके लिए ईसाई अथवा हिन्दू-मुस्लिम होना जरुरी नहीं रह गया है। वे बस खुद को इन्सान के रूप में पहचाने जाने की अपील करते हैं। उनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो धर्म और उनकी मान्यताओं को समाज के लिए खतरनाक मानते हैं। वे कहते हैं कि धर्मों द्वारा समाज में कटुता पैदा की जा रही है।

राजनीति में धर्मों का इस्तेमाल और भी घातक है। हिन्दू-मुसलमान आपस में लड़ रहे हैं, मुसलमान-ईसाई से, ईसाई किसी और से और फिर सब एक दुसरे से। इससे समाज में हिंसा पैदा हो रही है। इन्सान-इन्सान में भेदभाव पैदा हो रहा है और हर धार्मिक मतावलंबी अपने धर्म को बेहतर बता रहा है।

भारत भी कोई अपवाद नहीं है। भारत में सामाजिक भेदभाव का आधार ही धर्म और जाति रहा है। कुछ लोग संसाधनों और सुविधाओं पर काबिज होने के लिए वर्ण व्यवस्था बनाई। वर्णसंकर के विचार लाये और फिर लोग कई-कई सौ जातियों में समाज को बाँट दिया। एक छोटे से वर्ग को सारी सहूलियतें इस व्यवस्था में मिली, दुसरे को गुलाम सदृश जीवन। आज जाति और वर्णभेद के स्वरुप थोड़े बदल गए हैं, पर जाति-वर्ण आधारित भेदभाव जरी है। भारत की राजनीति का केंद्र बिंदु भी जाति-धर्म ही है। चाहे बाबरी मस्जिद और अयोध्या का मसला हो अथवा भारत पाकिस्तान का विभाजन व कटूता, मूल में धर्म आधारित पहचान व राजनीति ही है।

लेकिन सबकुछ ईधर नकारात्मक ही नहीं है। भारत में तेजी से तर्कशील युवाओं की पीढ़ी बन-बढ़ रही है। उनमें से कुछ खुद को तर्कशील कहते हैं, तो कुछ नास्तिक; कुछ धर्ममुक्त, तो कुछ खुद को संशयवादी। इस तरह से सोशल मीडिया का साथ पाकर तथा इन्टरनेट पर नए-नए विचारों से मुखातिब होकर नई पीढ़ी सोचने-समझने वाली तथा तर्कशील बन रही है। इसमें हर धर्म और तबके से आने वाले लोग है, पर खासकर वो लोग ज्यादा हैं, जो सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं।

सोशल मीडिया में भी सबसे अधिक लोकप्रिय फेसबुक है, उसके बाद व्हात्सप्प और यू-ट्यूब। यू-ट्यूब पर भी कई न्यूज़ चैनल हैं, जो अन्य खबरों से अलग भी नास्तिकता पर बात करते हैं। कुछ तो विशुद्ध तर्कशील और नास्तिक चैनल हैं। नई पीढ़ी में अब कई लोग युवाल नोआ हरारी और रिचर्ड डॉकिंस की भी बात कर रहे हैं। उनसे प्रेरित हो रहे हैं। इसके अतिरिक्त वे स्टीफन हॉकिंस के विचारों से भी बहुत प्रभावित हैं। कार्ल मार्क्स से तो वे पहले से ही परिचित हैं। पर सबसे ज्यादा अगर वे प्रभावित हैं, तो वे हैं भगत सिंह और ओशो। हालाँकि ओशो को कई अर्थों में नास्तिक नहीं कहा जा सकता, पर उनकी तार्कीक बातें युवाओं को खुद से सोचने को प्रेरित करते हैं।

नास्तिकों की बड़ी संख्या बौद्ध धर्म मानने वाले लोगों तथा अम्बेडकर की विचारधारा को मानने वाले दलित लोगों से मिलकर बनती है। भारत में बहुसंख्यक हिन्दू आबादी में से ही दलित और दुसरे अन्य लोग नास्तिकता को बढ़ा रहे हैं। वे हिन्दू धर्म को शोषक धर्म मानते हैं और बाबा साहेब द्वारा अपनाये गए बौद्ध धर्म तथा संविधान में अपनी मुक्ति देखते हैं। बौद्ध धर्म भी नास्तिकता की बात करता है और संविधान धर्मनिरपेक्षता की। दोनों ही भारत में नास्तिक अथवा तर्कशील आन्दोलन के बढ़ने के लिए अनुकूल है।

इनमें महिलाएं भी पीछे नहीं हैं। बड़ी संख्या में वे भी अब फेसबुक ग्रुप और व्हात्सप्प के माध्यम से तर्कशील राह पर आगे बढ़ रही हैं, नास्तिक बन रहीं। शादीशुदा और बच्चों वाली महिलाएं अपने बच्चों की परवरिश भी उसी के अनुरूप कर रही हैं। मेरी एक महिला मित्र हैं – रणजीत कौर और एक फेसबुक ग्रुप ‘विज्ञानवादी महिलाएं’ की एडमिन भी हैं; उनसे चर्चा होने पर खुद के लिए तथा बच्चों के लिए कहती है, “हम सब इंसान हैं, हम पर बचपन से ही धर्म का ठप्पा क्यों?

– शेषनाथ वर्णवाल