हम मकर संक्रान्ति 14 जनवरी को ही क्यों मनाते हैं?

आईये जानते हैं कि मकर संक्रांति क्या है और इसे 14 जनवरी को ही क्यों मनाते हैं? क्या इसे 14 जनवरी को मनाना सही है? क्या हैं वैज्ञानिक तथ्य और वे भारतीयों द्वारा पारम्परिक रूप से मकर संक्रांति मनाने के तर्क से मेल खाते हैं? इन सवालों के जवाब देने रहे हैं, एक्सपर्ट अर्पित द्विवेदी 


देश भर में लोहड़ी और मकर संक्रांति का पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है। लेकिन इस बार एक चर्चा बार-बार सुनी जा रही है कि मकर संक्रांति इस बार 14 जनवरी के बजाये 15 जनवरी को पड़ रही है। यही नहीं भविष्य में भी इसके 15 जनवरी को ही होने की बात कही जा रही है। ऐसे में जो लोग जीवन भर इसे 14 जनवरी को मनाते आ रहे हैं उनके मन में शंकाएं उठ रही हैं कि पर्व की तिथि में हुए इस अचानक बदलाव का क्या कारण है?

साथ ही इस पर्व के साथ एक अन्य शंका भी जुड़ी हुयी है, वह यह कि इस पर्व को उत्तरायनी पर्व के नाम से भी जाना जाता है। यानी इसे सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व भी कहते हैं। समाचार पत्र समेत तमाम संचार साधनों पर इस दिन सूर्य का उत्तरायण होना इसे मनाये जाने का एक महत्वपूर्ण कारण बताया जाता है। हिन्दू शास्त्रों में सूर्य का उत्तरायण होना शुभ माना जाता है। 

यही कारण है कि देश भर में करोड़ों लोग इस दिन गंगा स्नान के दौरान सूर्य को अर्घ देकर सांकेतिक रूप से सूर्य के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। परन्तु अक्सर ऐसा सुनने में आता है कि मकर संक्रांति को उत्तरायनी कहना गलत है। क्योंकि सूर्य वास्तव में 22 दिसंबर को ही उत्तरायण हो जाता है। यदि ऐसा है तो क्या हम आज तक गलत तिथि को मकर संक्रांति मनाते आ रहे हैं? आखिर मकर संक्रांति की सही तिथि क्या होनी चाहिए?

भारतीय पर्वों का निर्धारण दो प्रकार से किया जाता है, पाक्षिक पंचांगों द्वारा और नक्षत्रीय गणनाओं द्वारा। अधिकांश भारतीय पर्व पंचांगों पर आधारित हैं लेकिन कुछ पर्वों का आधार नक्षत्रीय गणना भी है। मकर संक्रांति एक ऐसा ही पर्व है जो नक्षत्रीय गणनाओं पर आधारित है। मकर संक्रांति असल में सूर्य के मकर राशी में प्रवेश के दिन मनायी जाती है। सूर्य का मकर राशी में प्रवेश किस दिन होगा इसका निर्धारण ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर किया जाता है। 

लेकिन दुनिया में प्रचलित ज्योतिषीय गणनाओं में भी भेद हैं। दुनिया में ज्योतिष की दो प्रकार की गणना पद्धति प्रचलित है। सायन व निरयण। दोनों में क्या भेद हैं इसे समझने के लिए आपको कुछ मूलभूत बातें पता होनी चाहिए।

प्राचीन काल से ही खगोलविदों के मध्य सही वर्षमान यानी एक वर्ष कब पूरा हुआ माना जाए?’ निर्धारित करने कि जद्दोजहद चलती रही है। एक वर्ष पूरा होने का अर्थ है पृथ्वी का सूर्य के परिक्रमा पथ पर पुनः उसी स्थान पर वापस आ जाना। लेकिन पृथ्वी पुनः उसी स्थान पर वापस आ गयी है इसका पता कैसे चलेगा?

इसको पता करने का एक साधारण तरीका है आकाशीय नक्षत्रमंडल में सूर्य का पुनः उसी स्थान पर वापस आ जाना। जो नक्षत्रमंडल हम रात्री आकाश में देखते हैं उसे यदि एक स्थिर पर्दे के जैसा मान लिया जाए तो उसके सापेक्ष हम अपने निकटस्थ पिंडों जैसे सूर्य चन्द्र तथा अन्य ग्रह इत्यादि की गति की गणना कर सकते हैं। प्राचीन खगोलविदों ने इसी को आधार बना कर आकाश को विभिन्न क्षेत्रों में विभाजित कर दिया, और हर क्षेत्र को उसमें मौजूद तारा समूह या नक्षत्र को एक पहचान दे दी। 

आज कुल 88 तारा समूहों जिनमें यह सम्पूर्ण दृष्य आकाश विभाजित है को अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ द्वारा मान्यता प्राप्त है। हमारे सौर मंडल के सभी गृह चूँकि एक चपटे डिस्क जैसे क्षेत्र में ही सूर्य की परिक्रमा करते हैं अतः ये सभी सूर्य समेत आकाश में एक काल्पनिक रेखा के दोनों ओर 8 अंश के क्षेत्र में ही दिखाई देते हैं जिसे राशिचक्र कहते हैं। राशियाँ कुछ और नहीं बल्कि इस राशिचक्र को ही 12 बराबर भागों में विभक्त कर इसमें मौजूद तारा समूह की आकृति के आधार पर उस भाग का किया गया नामकरण है। पर दिन में तो तारे दिखाई ही नहीं देते, तो हम कैसे पता करें कि सूर्य इस समय नक्षत्रमंडल में किस स्थान पर मौजूद है?

इसका पता सूर्योदय और सूर्यास्त के समय लगाया जा सकता है। रोजाना सूर्योदय से कुछ पूर्व यदि आप पूर्व दिशा में क्षितिज पर देखें तो आप पाएंगे कि क्षितिज पर मौजूद राशि हर दिन के साथ धीरे-धीरे क्षितिज से ऊपर की ओर खिसक रही है। और एक महीने बाद आप पाएंगे कि जो राशी पहले आपको क्षितिज पर दिखती थी वह अपने स्थान से ऊपर खिसक गयी है और उसके स्थान पर राशिचक्र में उससे अगली राशी उदित हो गयी है। 

यह वह राशी है जिसमें सूर्य एक माह पूर्व था, इससे अगली राशी में वर्तमान में है। इस तरह माह दर माह सूर्य एक एक राशी का संक्रमण करता जाता है और 12 माह बाद सम्पूर्ण राशीचक्र का भ्रमण कर वापस उसी राशी में लौट आता है।

आज चूँकि हम जानते हैं कि पृथ्वी ही सूर्य की परिक्रमा करती है, सूर्य तो इस परिक्रमा पथ के केंद्र में स्थित है। अतः सूर्य के राशीचक्र में आगे बढ़ते रहने का कारण पृथ्वी का परिक्रमा पथ पर आगे बढ़ जाना ही है। तो जब सूर्य सम्पूर्ण राशीचक्र का भ्रमण कर वापस उसी राशी में लौट आये जहाँ से हमने शुरू किया था तो इसका अर्थ है कि पृथ्वी ने सूर्य की एक परिक्रमा पूरी कर ली। 

..तो इस तरह हम सूर्य के राशिचक्र भ्रमण में लगने वाले समय की गणना कर वर्षमान निर्धारित कर सकते हैं। वर्षमान की इस प्रकार की जाने वाली गणना को निरयण पद्धति कहते हैं। परन्तु यदि हम इस पद्धति द्वारा वर्षमान निर्धारित करते हैं तो इससे वर्ष के मौसमों के समय में कुछ त्रुटी रह जाती है।

जैसा कि हम जानते हैं कि पृथ्वी पर मौसमों का कारण पृथ्वी का अपनी धुरी पर 23.5 अंश झुका होना है। इस झुकाव के कारण ही वर्ष के अलग अलग समय पर पृथ्वी का अलग अलग हिस्सा सूर्य के लम्बवत रहता है। सूर्य की किरणें जून के दौरन उत्तरी गोलार्ध तथा दिसम्बर के दौरान दक्षिणी गोलार्ध में सीधी पड़ती हैं। 

यही कारण है कि अप्रेल से सितम्बर तक उत्तरी गोलार्ध और अक्टूबर से मार्च तक दक्षिणी गोलार्ध में गर्मी का मौसम होता है। इसी झुकाव के कारण वर्ष के अलग-अलग समय में उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में दिन और रात की अवधियां भी भिन्न-भिन्न होती हैं। 21 जून उत्तरी गोलार्ध में सबसे बड़ा दिन होता है जबकि दक्षिणी गोलार्ध में यह सबसे छोटा दिन होता है। ठीक ऐसे ही 22 दिसम्बर दक्षिणी गोलार्ध का सबसे बड़ा दिन होता है और उत्तरी गोलार्ध में सबसे छोटा।

यदि जून और दिसंबर में आप सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक सूर्य के पथ का अवलोकन करें तो आप पायेंगे कि जहाँ जून में यह मध्यान के दौरान ठीक सर के ऊपर होता है तो वहीँ दिसंबर में यह आपको आकाश में कुछ दक्षिण की ओर मिलेगा। 22 दिसम्बर को यह अपने दक्षिणतम बिंदु पर पहुँच जाता है जहाँ से फिर यह वापस उत्तर की ओर गमन करना प्रारंभ करता है। इसे ही सूर्य का उत्तरायण होना कहते हैं। यदि हम निरयण पद्धति द्वारा वर्षमान निर्धारित करते हैं तो हम पायेंगे कि हमारे मौसम साल दर साल अपनी तिथियों से आगे खिसकते जा रहे हैं। जिसका कारण है पृथ्वी की अक्षीय अथवा पुस्सरण गति।

पृथ्वी मात्र अपने अक्ष पर घूमती ही नहीं बल्कि लट्टू की तरह नाचती भी है, जिसे पुस्सरण गति कहा जाता है। इसमें पृथ्वी अपने अक्ष पर झुके हुए लगभग 26 हजार वर्षों में एक चक्र पूरा करती है। हालांकि यह गति अत्यंत धीमी है लेकिन फिर भी इसके प्रभाव को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। इसी के कारण जब हम निरयण पद्धति द्वारा वर्षमान निर्धारित करते हैं तो सूर्य हमें वापस ठीक उसी स्थान पर नहीं मिलता बल्कि वह अपनी पूर्व स्थिति से कुछ अंश हट चुका होता है। सूर्य की पूर्व स्थिति और वर्तमान स्थिति का यह अंतर लगभग 20 मिनट का होता है। 

चूँकि हमें अपने दैनिक कार्यों के लिए ऋतुओं का ठीक ठीक समय ज्ञात होना जरुरी है, अतः कैलंडर में इस अंतर का ध्यान रखा जाता है। इस पद्धति द्वारा जो कैलंडर बनता है उसे सायन कैलंडर और उस वर्षमान को सायन वर्ष या सौर वर्ष भी कहते हैं। निरयण वर्षमान जहाँ 365 दिन 6 घंटा 9 मिनट 10 सेकेंड का होता है तो वहीँ सायन वर्षमान 365 दिन 5 घंटा 48 मिनट 46 सेकेंड का होता है।

सायन पद्धति में निरयण पद्धति की तरह नक्षत्रीय राशिचक्र के स्थान पर एक काल्पनिक राशीचक्र का प्रयोग किया जाता है जिसका प्रारंभ बिंदु बसंत सम्पात होता है। इस राशिचक्र को भी 12 बराबर भागों में बांटकर इसे मौजूदा नक्षत्रीय राशियों के ही नाम दे दिए गए हैं। अंग्रेजी कैलंडर जिसे पोप ग्रेगरी के नाम पर ग्रेगेरियन कैलंडर भी कहते हैं सायन पद्धति पर ही आधारित है। यही कारण है कि अंग्रेजी कैलंडर में सूर्य के दक्षिणायन और उत्तरायण होने की तिथि कभी बदलती नहीं। वहीँ हमारा भारतीय कैलंडर निरयण पद्धति पर आधारित होने के कारण हर 72 वर्षों में इसमें एक दिन का अंतर आ जाता है। मकर संक्रांति के भविष्य में 15 जनवरी को मनाये जाने का यही कारण है।

लेकिन जब सूर्य 22 दिसम्बर को उत्तरायण हो जाता है तो लोग मकर संक्रांति को उत्तरायनी क्यों कहते हैं? मेरी समझ से इसके दो कारण हो सकते हैं। हो सकता है भूतकाल में किसी समय भारत में सायन कैलंडर प्रचलन में हो। क्योंकि सूर्य का उत्तरायण होना और साथ ही मकर राशी में प्रवेश एक साथ केवल सायन कैलंडर में ही संभव है। या फिर यह भी हो सकता है कि अतीत में किसी समय सायन और निरयण कैलंडर में ज्यादा अंतर न रहा हो। 

बताया जाता है कि 23 मार्च सन 285 में सायन और निरयण कैलंडर एक ही थे। तब से निरयण कैलंडर हर 72 वर्षों में 1 दिन की दर से आगे बढ़ते हुए आज 24 दिन आगे निकल चुका है। चूँकि भारतीय कैलंडर निरयण पद्धति पर आधारित है इसलिए हमारे सभी त्यौहार भी 24 दिन आगे खिसक चुके हैं। तो क्या हम इतने वर्षों से गलत तिथियों में त्यौहार मना रहे हैं?

जहाँ तक मेरा मत है, निरयण पद्धति का सम्बन्ध नक्षत्रीय स्थितियों से अवश्य है, पर इससे ऋतुओं का निर्धारण ठीक-ठीक नहीं हो सकता। जबकि धरती पर समस्त जीवन समेत हमारे दैनिक कार्यकलापों और हमारे त्योहारों का सम्बन्ध ऋतुओं से ही है। हमारे देश और दुनिया के जितने भी प्रमुख त्यौहार हैं वे वास्तव में फसलोत्सव ही हैं। इसलिए मेरे विचार से यदि बात त्योहारों की है तो उनका निर्धारण सायन कैलंडर से ही होना चाहिए।

लेखक परिचय: अर्पित द्विवेदी इंजीनियर हैं और एरोमॉडलिंग पढ़ाते हैं।

तस्वीर: प्रतीकात्मक पत्रिका से साभार। 

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