क्या मजहब लालची लोगों का जमावड़ा है?



दुनिया के तमाम मज़हब के ठेकेदार लालच का सबक़ जरूर देते हैं और लालच उसी को दी जाती है जिससे अपना कोई व्यक्तिगत लाभ प्राप्त करना हो। इसी तरह मुसलमान बुनियादी तौर पर लालची क़ौम है। कोई भी काम करेंगे तो उसमें लालच जरूर होगी। मुसलमानों में लालच बचपन से ही ठूंसी है।

1. मस्जिद भी बनाएंगे तो वह भी लालच में कि जन्नत में हमारा बहुत अच्छा आलीशान घर बनेगा और ये लालच देने वाला मौलवी मुल्ला होता है। क्योंकि उनका अपना भी रोजी रोटी का मसला होता है। जब इंसान लालच में आएगा, तब ही मौलवी का मस्जिद के साथ अपना घर भी बनेगा और उनका घरेलू खर्च भी चलेगा।

2. फलां काम करोगे, तो इतना सवाब मिलेगा। अगर कोई अक़्लमंद पूछ ले कि कितना सवाब मिलेगा? किलो के हिसाब से या मीटर या गज़ के हिसाब से। सही जवाब तो नहीं मिलेगा, मगर उस इंसान का ईमान कमजोर समझो उन मौलवियों के सामने, बस बहुत सवाब मिलेगा मरने के बाद।

3. यहां दूसरे इंसान की मदद इसलिये की जाती है कि मरने के बाद इसका दस गुणा ज्यादा मिलेगा। भूखों को खाना इसलिये नहीं खिलाते हैं कि वो भूखा है, मरने के बाद इसका दस गुणा रिटर्न मिले इस लालच में खिलाते हैं।

4. आख़िरत संवारो,  क्योंकि आख़िरत में जन्नत मिलेगी। अब वो आख़िरत संवारने के चक्कर में इस दुनिया में जीना भूल जाता है, न खुद जीता है न अपने परिवार या दूसरे लोगों को चैन से जीने देता है।

अब सवाल उठता है कि जन्नत में क्या होगा?

लालच से भरपूर जवाब दिया जाता है कि वहां मोटी मोटी आंखों वाली हूरें होगी, दूध की नदियां होंगी, शराब मिलेगी जिसके पीने से सर दर्द भी नहीं होगा।

ये हैं वो लालचें जिनमें मोमिन को फंसाया जाता है क्योंकि अगर मोमिन ने ये सब अय्याशी दुनिया में ही कर ली तो फिर अल्लाह का जन्नत बनाने का क्या फायदा??

..और फिर मौलवियों मुल्लाओं का क्या होगा? उनकी दाढ़ी रंगीन कैसे होगी?

गर्ज़ ये कि हर काम में उचित मात्रा में लालची तत्व का होना अति आवश्यक है। चाहे वो कुछ भी हो, गरीब की मदद भी करेंगे तो भी आख़िरत संवारने की लालच, रोज़े कुबूल होने की लालच, हज और नमाज़ के पीछे भी छुपी है लालच।

सर से पांव तलक लालच से भरे हुए उस इंसान का नाम है "अहले ईमान मोमिन" जो अल्लाह और उसके नबियों पर ईमान भी लालच की बुनियाद पर ही रखता है।

~ सलीम ज़फर

तस्वीर प्रतीकात्मक, UMMAHWIDE से साभार