"नास्तिकता हमें मानसिक ग़ुलामी से आज़ाद करती है"


मार्च 23, 2019 को शुरू हुआ 'नास्तिक दिवस' याद कर लीजिए क्योंकि ये तारीख़ है एक नयी क्रांति की। एक नयी शुरुआत की। नास्तिकता की यह शुरुआत है, एक ऐसा विश्व बनाने की, जो मुक्त होगा हर धर्म नाम की काल्पनिक बेड़ियों से। धर्म जो हमें विज्ञान से दूर ले जाते हैं, हमारी बौद्धिक क्षमता को एक दीमक की तरह जीवन भर कुरेदते हैं।

क्या किसी सामान्य इंसान को देखकर ये बताया जा सकता है कि वो किसकी संतान है? भगवान की, अल्लाह की या गॉड की? बेशक नहीं बताया जा सकता। सिर्फ़ यही सुनिश्चित किया जा सकता है कि वो एक इंसान की संतान है, बाक़ी सबकी तरह उसे भी भोजन, वायु और जल की अवश्यकता है, जीवित रहने के लिए। बस नास्तिकता भी सिर्फ़ इतना ही सिखाती है।

डार्विन की विकासवाद की थ्योरी ने यह सिद्ध किया कि जीवन विज्ञान की देन है, न कि किसी ईश्वर की। एक माइक्रोओर्गनिज्म से इंसान तक का सफ़र बहुत लम्बा था। ये विकसित दिमाग़ हमारे पूर्वजों की देन हैजो महत्वाकांक्षी थे, जो तत्पर रहते थे हर चीज़ का कारण जानने के लिए।

और बस फिर कुछ भले मनुष्यों ने कुछ किताबें लिख दीं, कुछ कहानियाँ कह दीं और हमें ईश्वर मिल गया। यह ईश्वर तब नहीं था, जब हम आदिमानव थे। ये ईश्वर तब तक नहीं था, जब तक हमें लिखना पढ़ना बोलना नहीं आया। जैसे ही हम एक दूसरे को मूर्ख बनाने क़ाबिल हुए, तब इस ईश्वर ने जन्म लिया और हमारे लिए क़ायदे क़ानून लिख दिए जिन्हें हम धर्मों के नाम से जानते हैं।

आजतक अंधभक्त उस ईश्वर को ढूँढते हैं; कभी मंदिर में, कभी मस्जिद में तो कभी चर्च में। ईश्वर के बनाए धर्मों से हमें भेदभाव के अलावा कुछ नहीं मिला। इन धर्मों ने हमें हर प्रकार का भेदभाव सिखाया। चाहे वो खानपान में हो या वेशभूषा में। यहाँ तक की जीवन-साथी चुनने में भी।

इस अलगावपन ने कब हिंसा का रूप ले लिया हमें पता भी नहीं चला। आज विश्व कई गुटों में बँटा हुआ है- मुस्लिम, ईसाई, हिंदू और न जाने कितने। बाँध दिया इस धर्म रूपी ज़ंजीर ने और कुछ अति चतुर इनके ठेकेदार बनकर बैठ गए हमें क़ाबू में रखने के लिए। रीति रिवाज परम्परायें बना दीं, ताकि इन ज़ंजीरो को तोड़ना और मुश्किल हो जाए।

न जाने कितने प्रकार के पाखंडों को जन्म दिया, इन धर्मों ने और हम फिर भी सोए हैं। वास्तविकता से परे रोज़ एक ग़ुलाम की तरह उस काल्पनिक ईश्वर को जपते हैं।

नास्तिकता हमें मानसिक ग़ुलामी से आज़ाद करती है। हमें अवगत कराती है अपनी मनुष्यता से। दूर रखती है हर प्रकार के भेदभाव और पाखंड से। नास्तिकता हमें स्वतंत्र होकर जीना सिखाती है। आओ हम सभी आज प्रण लें एक स्वतंत्र मनुष्य बनने की। प्रण लें ग़ुलामी, पाखंडवाद, हिंसा, रूढ़िवाद से दूर रहने की। प्रण लें, मनुष्य को सिर्फ़ मनुष्य समझने की।

– रूचि अग्निहोत्री  

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