ईश्वर पूजा के नाम पर पर्यावरण का 'कचरा' मत करिए ...प्लीज !!



हमारे धर्मों में ईश्वर की पूजा हो, मंदिरों-मस्जिदों की सजावट हो या दरगाह पर चढ़ने वाली चादरें, फूलों का हमसे अटूट सम्बन्ध है। और सिर्फ पूजा ही क्यों, शादियों में, जलसों में, सजावट में हर जगह फूल हमारी जिंदगी से जुड़े ही रहते हैं यहाँ तक की मरने के बाद तस्वीरों पर चढ़ने वाले हार के रूप में भी।

हम फूलों को अपनी भावनाओं से अपनी श्रद्धा से जोड़कर देखते हैं मंदिरों के प्रांगण में फूलों की टोकरियों को लेकर जब हम अपने इष्टदेव पर चढ़ाते हैं, मानो दिल को एक तस्सली होती है कि पूजा ठीक से हुई। लेकिन इस सुन्दर मोड़ के बाद की भयावह कहानी आपमें से कितने लोग जानते हैं

अगर हम पूछें कि आपके फूल चढाने के बाद अगले दिन ये फूल कहाँ जाते हैं, तो आपमें से कई लोग कहेंगे, इन पवित्र फूलों को कचरे के डिब्बे में फेक नहीं सकते; इसलिए इन्हे किसी स्थानीय सरोवर, नदी या कुए में विसर्जित कर दिया जाता है, और मुंबई जैसे शहरों में अतंतः समुद्र में।  चलिए अब आगे की कहानी हम आपको बताते हैं

सन 2015 के आंकड़ों के हिसाब से भारत में पुष्प उद्योग 8000 करोड़ का हो चूका है और हर साल इसमें 30% की बढ़त हो रही है। केवल मंदिरों की बात करें, तो सूचीबद्ध मंदिरों की संख्या कुछ 6 लाख है इनके अलावा मस्जिद, दरगाह, चर्च, गुरूद्वारे और अन्य सम्मेलन आयोजन अलग से।

एक सर्वे के हिसाब से हर साल केवल भारत में 80 लाख टन हार-फूल देश भर की नदियों में फेंके जाते है। देश भर में फूलों की भारी डिमांड को देखते हुए फूलों की खेती करने वाले किसानों ने बड़े पैमाने पर रासायनिक कीटनाशकों और खादों का प्रयोग करना शुरू कर दिया है। ये रासायनिक स्प्रे और कीटनाशक जब हमसे होते हुए नदी नालों के पानी में जाकर मिलते हैं, तो साफ पानी को भी जहर जैसा हानिकारक (PH4) स्तर  बना देते हैं।

सन 2005 की WHO रिपोर्ट के हिसाब से इन फूलों पर डाले जाने वाले रसायनो में 36% रसायन इतने ख़तरनाक हैं कि इनके संपर्क में आने वाले मनुष्यों को खुजली, नज़रों की कमज़ोरी, अस्थमा और यहाँ तक की त्वचा का कैंसर तक हो सकता है। अधिकतर फूलों के खेत में औरतें और छोटे बच्चे काम करते हैं, जो इन रसायनों के प्रभाव से अनभिज्ञ होते हैं।

International Journal for Research in Applied Science & Engineering Technology (IJRASET) के प्रदीप कुमार जी ने Impact of Waste Flower on Environment शीर्षक के अपने शोध में स्पष्ट किया है कि फूलो की खरीदी में कमी लाने की जागरूकता फैलाने वाली एक वेबसाइट Flowerpetal.com अकेले ‘वेलेंटाइन डे’ पर 100 मिलियन गुलाब के फूलों से 9000 मेट्रिक टन कार्बन-डायऑक्साइड (Co2) पैदा होती है। 

हमारे द्वारा धार्मिक समारोहों में थोड़ी देर की सजावट करने वाले ये फूल सड़ने के साथ वातावरण में भयंकर CH4 (मीथेन) और CO2 छोड़ते हैं। आपको यहाँ बता दें कि वैश्विक तापमान को बढ़ाने में मीथेन, कार्बन-डाइऑक्साइड से 72 गुना ज्यादा ताकतवर होती है।

ऐसे रासायनिक तत्व जब पानी में मिलते हैं, तो बड़े पैमाने पर मछलियों, कछुओं और जलीय जीवों की जान ले लेते हैं। सड़कों और कूड़े के ढेर में जब गाय भैसें इन्हें खाती हैं, तो भयंकर आतों के रोग का शिकार बनती हैं।

संक्षेप में कहें, तो श्रद्धा से भरी इस कहानी का केवल पहला हिस्सा ही सुन्दर है और बाद का पूरा भाग दोषों और हानियों से भरा पड़ा है। एक पल के लिए विवेकपूर्वक सोचिए कौन-सा भगवान, खुदा, गॉड इस महाहानिकारक प्रक्रिया का हिस्सा बनकर आपको आशीर्वाद देगा। हज़ारों जीवों की मौत और पर्यावरण के नुकसान का पाप आपको किस तरह सुख से जीने देगा।

मित्रों! ऋषि-मुनियों के समय और आज के समय में बहुत अंतर आ गया है जो रीतियाँ परम्पराएँ पहले चल जाती थीं, वे अब अनर्थ कर सकती हैं। इसलिए अगर आप वाकई एक जागरूक नागरिक है, या धर्म से प्यार करते हैं, तो आज से ही सभी प्रकार के कार्यक्रमों में फूलों का प्रयोग तुरंत बंद करे दें।

यदि आपका ईश्वर संवेदनशील होगा, तो ईश्वर को आपकी भावनाओं की क़द्र होगी न कि पैसा, वातावरण और जीवन बर्बाद कर इक्कठे किये फूलों की। क्या हम धार्मिक और सामाजिक जीवन में यह बदलाव ला सकते है?

   – प्रोफेसर (डॉ.) ऋषि आचार्य

  तस्वीर प्रतीकात्मक BBC से साभार  

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