"उस ईश्वर को बेचा जा रहा है, जो कि है ही नहीं।"



हमारे आस-पास अस्तिकता का इतना गहरा जाल है कि तर्क पैदा ही नही होने देते।  ईश्वर नाम का प्रोडक्ट बेचने के लिए कईयों मार्केटिंग स्ट्रेटेजी हमारे आस पास इतनी गहरी गुथी हुई है कि बच के निकलना आसान नही। ऊपर से घर में माता पिता भी बाय डिफ़ॉल्ट आस्तिक ही मिलते हैं। लेकिन मैं आस्तिक तो कभी भी नहीं रही, क्योंकि शुरू से ही मेरे प्रश्न बहुत होते थे।

कब, क्यों, कहाँ, कैसे, कितना आदि आदि का तूफान रहता था। हर बात अपने लेवल पर चेक करनी होती थी और इसमें मेरे पापा का बहुत साथ रहा। पापा अपने जमाने के मात्र मैट्रिक ही थे, पर गजब के सिख ड्रेसकोड वाले नास्तिक थे और चुटकलों व रेशनल तरीके से ही वास्तविकता से अवगत करवा देते थे, बुद्ध स्टाइल नास्तिक..।

जब उनका कोई मित्र ग्रहों आदि से पीड़ित या ज्योतिष उपायों  से त्रस्त हो आते, तो सीधे सरल शब्दों में समझा देते थे कि अगर तेरे पास पैसा नहीं है, तो कोई भी शनि और राहु तेरा कुछ भी बिगाड़ अथवा सुधार नही सकता।

भारत में सभी बच्चों के दिमाग में ईश्वर नामक सॉफ्टवेयर बचपन से ही इंस्टॉल करना शुरू कर देते है। मेरे साथ भी वही हुआ था, पर बड़े होने के साथ साथ मुझे उसकी जरूरत कभी नही पड़ी, क्योंकि समय के साथ साथ शिक्षा भी मिली व जॉब भी मिल गई।  ..तो औरों पर निर्भरता खत्म सी हो गई। बल्कि मैं ही अपने भाई-बहनों की मदद करने लगी। अपनी सिस्टर को बारहवीं करवाई। वह इसलिए क्योंकि मैं अफ्फोर्ड कर सकती थी। मेरी जिन्दगी में खुद मुझे डर, भय, लालच नहीं हुआ, बोले तो सेल्फ-मैनेज्ड लाइफ टाइप रही।

लेकिन 30-35 साल की उम्र में, कुछ पारिवारिक मुश्किलें खड़ी हुई, तो सभी किस्म के यंत्र, मंत्र व तंत्र वो भी एक्सपर्ट की दिशा निर्देश मे किये।  पर कुछ हल न निकला, बल्कि पैसा भी लग गया और शारीरिक, मानसिक, आर्थिक नुकसान भी हुआ। तब से बचा-खुचा ईश्वर भी दिमाग से गायब ही हो गया।

अब मै देखती हूँ, हर गली-नुक्कड़ पर ईश्वर को बेचने के क्रियाकलाप किये जा रहे हैं। उस ईश्वर को बेचा जा रहा है,  जो कि है ही नहीं। बार खूब बिक रहा है। है न, गजब का धंधा ? कोई इन्वेस्टमेंट नही, कोई क्वालिफिकेशन नहीं चाहिए, कोई गारन्टी नही मांगता, कोई वैलिडिटी नहीं मांगता, कोई प्रूफ नही मांगता, किसी की जवाबदेही नहीं है, कोई मेहनत भी नहीं और कोई सज़ा भी नही है, इस घोटाले की।  

आज की डेट में, मैं खुद को ज्यादा नैतिक, पर्यावरण के प्रति संवेदनशील, मानवतावादी पाती हूं, बजाए उनके जो आँख बंद करके ईश्वर के नाम पर खुद को लुटवाते हैं तथा अप्राकृतिक उपाय करते हैं ताकि उनके हालात बेहतर हो सकें। जबकि उनको समझ नहीं आता कि हालात खुद ही मैनेज करने पड़ते हैं।

मैं अब अपने को बेहतर अवस्था मे पाती हूं, जब मैं दुसरे जरूरतमंदों की मदद कर पाती हूं। अप्राकृतिक उपाय नहीं करती हूं, अपने बच्चे को रेशनल बनाने की कोशिश करती हूँ, सच मानिये, अच्छा लगता है। वह इसलिए क्योंकि समाज मे औरत का नास्तिक होना, मतलब बच्चों का नास्तिक होना है। इससे हम अपनी एनर्जी, समय व धन अपने व समाज की बेहतरी मे खर्च कर सकेंगे।


लेखिका नास्तिकता प्रचार अभियान से जुडी हैं तथा तर्कशील और वैज्ञानिक सोच को समाज में बढ़ाने के लिए सक्रिय हैं। यदि उनके बारे में, आप और अधिक जानना चाहते हैं, तो आप उन्हें फेसबुक पर फॉलो कर सकते हैं। फॉलो करने के लिए उनके नाम (लिंक) पर क्लिक करें।

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