पढ़िए 10 साहसी महिलाओं के नास्तिक बनने की कहानी, उन्हीं की जुबानी

भारत में धार्मिक रीति रिवाजों की परंपराओं को निभाने की जिम्मेदारी महिलाओं के ऊपर थोपा हुआ है। महिलाओं के लिए डर-डर के जीना, आत्मविश्वास में कमी होना, अपने आत्म-सम्मान व स्वाभिमान को कुचल कर जीना एक मजबूरी है। इसके पीछे धर्म ही बड़ा कारण है, जो कि सम्पूर्ण मिथ्या के ऊपर आधारित है। इसी क्षेत्र में अब कई महिलाएं अत्यंत आत्मविश्वास के साथ इस तथाकथित भगवान को सम्पूर्ण अस्वीकार कर चुकी हैं। अब वे निडर व बिंदास महिलाएं नैतिकता व मानवीयता के साथ जीवन जी रही हैं और आगे बढ़ रही हैं। समाज में लोगों को इसी दिशा में नई राह दिखाने की प्रेरणा बनी हुई है।

तस्वीर प्रतीकात्मक Religion and Politics से साभार


10 ऐसी साहसी महिलाएं, जो अंधश्रद्धा से निकल कर नास्तिक बन गईं, तो पढ़िए उनकी कहानी। 

भारत के परिवेश में बच्चे को जन्म से कुछ और मिले न मिले, पर भगवान का कंसेप्ट बचपन से ही दिमाग मे ट्रांसप्लांट कर दिया जाता है। ..और मेल/ फीमेल दोनो ही एक समान उसे कैरी करते हैं।

उस हिसाब से भगवान पर प्रश्न उठाना सिखाया ही नही जाता। मेरे साथ भी ऐसा ही था। सिख फैमिली में जन्म हुआ तो अंधविश्वास, पाखण्डरूढ़िवादिता आदि तो पहले से ही नहीं है हमारे समाज में। पर भगवान का कन्सेप्ट जरूर डाला गया था।

पर मैं रूढ़िवादि परंपराओं को समझती थी, और उसकी अवधारणाओं पर पकड़ अच्छी थी, तो धीरे-धीरे भगवान का कंसेप्ट भी खत्म होता गया। वैसे भारत की शिक्षा-प्रणाली से आप तर्कशील कैसे बन सकते हो? जब घर में बचपन से ही भगवान को बच्चे की दिमाग में अवस्थापित कर दिया जाता हो।

..पर मेरे साइंस ग्रैजुएट  होने के नाते, धीरे-धीरे यह कंसेप्ट भी क्लियर होते गए।

घर पर मां आस्तिक और पापा नास्तिक थे और पापा बहुत  उत्साहित करते थे।  मुझे कभी हतोत्साहित नहीं होना पड़ा भगवान के नाम पर। लेकिन 30-35 साल के होते होते, जो भगवान बचपन से दिमाग में बैठाया गया था, वो भी धुँधला होने लगा। फ़िर मुझे भगवान होने या न होने से कोई फर्क नही पड़ने लगा। आज तो मैं भगवान की सत्ता के प्रति बिलकुल शून्य हो चुकी हूँ।

मुझे फर्क ही नही पड़ता कि भगवान है कि नहीं।।

मैं नास्तिक हूं। करीब 10 साल पहले गजब की आस्तिक थी। नंगे पैर रोज शाम को हनुमान मंदिर जाती थी। हनुमान चालीसा पढ़ती थी। 12वीं की छुट्टियों में मैं एक दिन मंदिर गई हुई थी, तो मंदिर के पंडित ने मुझसे छेड़छाड़ की, तो मेरी निगाह मूर्ति की तरफ गई, लेकिन मूर्ति को कोई फर्क नही पड़ते देख, खुद ही हिम्मत की और दो थप्पड़ दिए पंडित के कान पर। उस दिन भाग कर घर आई और खुद से खुद की लड़ाई शुरू हुई। विश्वास और तर्क की लड़ाई। जिसमें तर्क की जीत हुई।

फिर मैंने कॉलेज में दर्शनशास्त्र विषय लिया, और तर्क की ताकत को समझा; और तबसे नास्तिक हूँ, घोर नास्तिक।।

मैं ओडिशा की एक अत्यंत धार्मिक परिवार में पैदा हुई थी। मेरे मां-बाप धार्मिक और ब्राह्मण हैं। पर मुझे कभी धर्म या भगवान पर विश्वास नहीं हुआ था। कभी-कभी भगवान के आगे माथा टेक देती थी, पर वह बस एक यांत्रिक प्रकिया  होती थी। मेरे मां-बाप ने मुझे कभी भी कोई भी धर्मिक रीति-रिवाजों को पालन करने या मंदिर जाने को कभी फ़ोर्स नहीं किये थे। घर में बहुत सारे धार्मिक किताबें होते थे जिन्हें मैं पढ़ा करती थी। पर मैं उन किताबों से कभी सहमत नहीं हो पाती थी।

मेरे घर में लड़की या लड़का में कभी कोई फर्क नहीं समझा गया था। मैं और मेरी बहनें सारे काम खुद स्वतंत्र ढंग से करते थे। कोई भी रोक टोक नहीं थी। मां बाप ने हमारे पढ़ाई पर हमेशा ध्यान दिए थे। मैं बचपन में बहुत कम बातें करती थी और कम हंसा करती थी। हमेशा चिढ़ी हुई सी रहती थी। मेरे आस पास में होने वाले किसी भी डिस्क्रिमिनेशन चाहे वो जातिगत हो या लिंगगत मुझे परेशान करते थे। मैं किसी भी विषमता को सहन नहीं कर पाती थी। बहुत ही प्रतिरोधात्मक रबैया था मेरा। और ये सब मेरे गुस्से का कारण था।

किसी भी लोअर कास्ट को छूने के बाद हमें कपड़ा बदलना पड़ता था। पर हमेशा मैं उनके घर में बच्चोंके साथ खेलने जाती थी, पर घर आने के बाद कभी भी ड्रेस चेंज  नहीं करती थी। हमेशा मां से झूठ बोलती थी कि मैंने किसीको नहीं छुआ है। मेरे घरके बगल में एक चाचू रहते थे। वे अपने दो बेटियों को बिल्कुल प्यार नहीं करते थे। मुझे ये सब देख के गुस्सा आता था। मुझे जेंडर डिस्क्रिमिनेशन इतना ज्यादा परेशान करता था कि मैं छोटे छोटे लड़कों को प्यार नहीं करती थी। उन बच्चों के लिए भी मेरे दिल मे गुस्सा रहता था।

लड़कियां रात को क्यों नहीं बाहर जा सकती? ये बात पर भी मुझे बहुत गुस्सा आता था। मैं जान-बूझ के रात को घर से बाहर चली जाती थी। मेरे बड़ी बहन मेरे इस बेबाकपन से बड़ी परेशान रहती थी कि कहीं मुझे कुछ ना हो जाये। भय और लज्जा जैसी फिलिंग्स मेरे अंदर कभी नहीं आई। मैं अपनी पिताजी के सामने भी बड़ी सहजता से ड्रेस चेंज कर लेती थी। जब मेरी बहन मुझे टोकती थी, तो मैं उन्हें ये पूछती थी पिताजी तो पिता हैं उनके सामने ड्रेस क्यों नहीं चेंज कर सकती?  वैसे भी मैं ड्रेस चेंज करते समय कभी दरबजा या खिड़की बन्द नहीं करती थी। एक बार मेरी बहन ने पूछा तुम दरवाजा क्यों बंद नहीं करती हो? कोई अगर तुम्हरी बदन को देख लेगा तो? मैंने उत्तर दिया था, मुझे तो किसी पुरुष की बदन को देख कर कुछ नहीं होता, तो उनको क्या प्रॉब्लेम है?

किसी भी सुनसान जगह पर मुझे कभी डर नहीं लगता था। किसी भी इंसान से इनसिक्योरिटी फील नहीं होती थी। मेरी यही सब स्वभाव मेरे घरवालों को परेशान करता था। लड़कियों को पीरियड्स के दौरान होनेवाले सामाजिक रीति रिवाज मुझे पसंद नहीं होते थे। एक बार मैं जानबुझ कर पूजा के फूल और दीप को छू लिया था। और मेरी बहन की नजर में पकड़ गयी थी। उन्हीं ने मेरे भूल की माफी के लिए भगवान से दिनभर प्रार्थना की थी।

और एक बात जो मुझे बचपन से ही परेशान करता था, वह है विधवा प्रथा। मेरी बुआ जी बाल्य विधवा थी। उन्हें सजना, संवरना, रंगीन कपड़े पहनना और नॉनवेज खाना मना था। उन्हें देख के मुझे बहुत दुख होता था। सोचते-सोचते ये निष्कर्ष में पहंची थी कि शादी ही सारे प्रॉब्लम की जड़ है। ना शादी होगी, ना कोई विधवा होगा। मुझे शादी से बहुत नफरत हो गयी थी। मैं सोचती थी, मैं कभी जिंदगी में शादी नहीं करूंगी। जब मैं शादी की उम्र तक आयी, तब मैं लव मैरिज को पसंद करने लगी।

लड़के वाले द्वारा लड़कियों को शादी के लिए देखने आने का रिवाज मुझे कतई पसंद नहीं था। मैं घर में यही बात साफ साफ बोल दिया था कि मैं अपने मर्जी से शादी करूँगी, कोई मेरे लिए ढूंढने की जरूरत नहीं है। मेरे सारे बातों को बिरोध करने का नजरिया या मानसिकता, बेबाक खुदको एक्सप्रेस करना जैसे बातों से मैं भीड़ से अलग रहने लगी थी। किसी से आसानी से मिल नहीं पाने के वजह से मेरे ज्यादा दोस्त भी नहीं थे। 

लड़कियों के लड़की लड़की जैसी बातें मुझे बिलकुल पसंद नहीं आती थी। न की गहने मुझे कभी पसंद आते थे। मेरे खड़ूस स्वभाव के वजह से मुझे पसंद करने वाले लड़के भी मेरे सामने कभी अपने दिल की बात नही कर पाते थे। मैं बहुत दिनों तक खुद को अबनॉर्मनल समझ रही थी। दुनिया में शायद मैं ही अबनॉर्मनल हूं, ऐसा सोचती थी।

फिर 2012 में ऑक्सीडेंटली, मुझे फेसबुक में एक फ्रेंड मिली। जो मुझे एक नास्तिक ग्रुप में जोड़ दिया। तब मुझे पता चला मेरे जैसे बहुत लोग हैं, इस दुनिया में। और जो मेरी मेंटलिटी है उसे नास्तिकता कहते हैं। और मैं बिल्कुल भी अबनॉर्मनल नहीं हूं। उसके बाद में खुद को खुल कर एक्सेप्ट करने लगी और पब्लिकली एक्सप्रेस करने लगी। फेसबुक ने मुझे बहत ही प्यारे लाइक माइंडेड दोस्त दिए और मैं जिंदगी में ज्यादा खुश और बिंदास रहने लगी। मेरी खुशी में मेरे हस्बैंड भी साथ देने लगे। नास्तिकता एक शक्ति की तरह है, जो इंसान को आजाद कर देता है और एक भयमुक्त खुशहाल जिंदगी के और ले जाता है।।

मेरे पिताजी एक लेफ्टिस्ट संगठन के साथ जुड़े हुए थे। पर उस संगठन में  कुछ समस्या दिखाई देने के कारण उन्होंने संगठन का कार्य करना बंद कर दिया। मैं उस समय स्कूल में थी और वो सारे किताबें पढ़ना पसंद करती थी जो लेफ्टिस्ट ideology को दर्शा रहा था। मेरा घर ओड़िशा का एक ब्राम्हण शासन में था। वहां की सारे लोग बहत ही अंधविश्वासी हैं। मुझे बचपन से ही वो सब बातें व जातिभेद आदि बहुत ही आंदोलित करता था।

मेरी एक दोस्त जो lower कास्ट की थी, उसे छूने के लिए मेरी दादी माँ मुझे मना करती थी। मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता था। मेरे पिताजी भी मुझे समझाने की कोशिश किया करते थे कि हमारे और उनमें फर्क है। उस दिन मुझे समझ में आया कि लोगों का बोलना और काम में कर के दिखाने में फर्क  होता है। बाबा जो ideology पढ़ते थे, उसे असल जिंदगी में नहीं लगाते थे।

मैं तब से अकेली अपनी लड़ाई शुरु कर दी। किसी को भी blindly विश्वास नहीं करती थी। जब भगवान की बारी आई, तो उसे भी मैं बिना सोचे समझे विश्वास ना कर पाई। मैं खुद ही अपने आप से प्रश्न करती थी और सही उत्तर भी ढूंढ़ती थी। मेरा तर्क मुझे बताया कि भगवान नाम का कोई चीज है ही नहीं। मैं कालेज में थी, तब से कोई पत्थर को कभी भी नमस्कार नहीं किया है। मेरी जैसी लोगों की तलाश में थी, तब बाल्मीकि नायक जी के किताबों के बारे में पता चला। और उन किताबों को पढ़ने के बाद मैं और भी तर्कशील बन गयी। अब मैं खुद को एक नास्तिक कहने में गर्व महसूस करती हूं।।

मेरा जन्म उन्नाव में 20 मई, 1994 को हुआ। मेरे फादर नायब तहसीलदार थे, मेरी मां हाउसवाइफ थीं। मैं सबसे छोटी थी। मेरी चार बहनें, दो भाई थे और मैं लखनऊ में स्टडी के लिए अपनी भाई-बहनों के साथ 98 में आई। मेरे फादर बाहर जॉब करते थे। मेरी मां भी उन्हीं के साथ रहने चली गई। एक दिन अचानक फरवरी 2000 में उनकी अकस्मिक डेथ हो गई। उसके बाद हमारे बड़े भाई हम सब को लेकर फिर से उन्नाव चले गए और मैं बहुत छोटी थी।

मुझे तो पता भी नहीं था कि जिंदगी क्या होती है, पर इतना पता था कि फादर ना होने पर दुख कितना बड़ा होता है। मैं बचपन से पिता का प्यार ढूंढती रही और नहीं मिला उसके बाद 2001 में मैं फिर से लखनऊ अपने परिवार के साथ आई और पढ़ाई स्टार्ट हुई। उसके बाद हाईस्कूल करने के बाद इंटर में फेल होने के बाद शादी के लिए दबाव होने लगा, और हमें शादी करनी पड़ी।

2012 में, मैं शादी नहीं करना चाहती थी, पर मैं करती भी तो क्या? घर में मना करती थी, तो भाई ने कहा, “जो भी करना हो शादी के बाद करना। यह मेरी आखिरी जिम्मेदारी है, इसे भी मैं पूरा कर दूं, तो अपने फादर कि मैं सारी जिम्मेदारियां पूरी कर दूंगा।” इस वजह से मुझे शादी करनी पड़ गई । और शादी में एडजस्ट करते करते 2 बच्चे भी हो गए।

फिर अचानक से मैंने अपने महापुरुषों की विचारधारा को आगे ले जाने का संकल्प लिया और अपने पति को 2017 में डिवोर्स दे कर समाज में जा जाकर लोगों को जागरूक करने का काम करने लगी। महिलाओं को उनके अधिकारों के विषय में जानकारी देने लगी और लोगों की हेल्प करने लगी। मुझे एहसास हुआ कि हमारे समाज में बहुत ज्यादा पाखंड फैला हुआ है जिसे मैं मिटाना चाहती हूं। इसके लिए मैं छोटे बड़े कार्यक्रम करती रहती और अगर कोई भी अपने कार्यक्रमों में मुझे बुलाता है, तो मैं जरूर जाती हूं। इस वजह से अपने लखनऊ से दूर दिल्ली में आकर रहने लगी।

एक सपना लेकर कि देश बदलना है, देश में पाखंड फैला है उसे मिटाना है। समाज में जागरूकता लानी है। इस वजह से मैं न्यूज रिर्पोटिंग का भी काम करने लगी और समाज सेवा भी इसी के साथ साथ कर रही हूं, समाज सुधार भी रही हूं मैं। आगे भी समाज के लिए करती रहूंगी और मेरा मकसद है सत्ता को हासिल करके इंडिया में परिवर्तन लाना, विज्ञान को बढ़ावा देना, पाखंड को देश से हमेशा के लिए हटा देना, शिक्षा-स्वास्थ्य-सुरक्षा-न्याय, यह सारी सुविधाएं जन-जन तक पहुंचे, यही हमारा लक्ष्य है। मैं प्रधानमंत्री बनना चाहती हूं। कोशिश कर रही हूं। आगे प्रकृति पर डिपेंड करता है कि मैं बन पाऊंगी या नहीं।।

मेरा नाम पूजा शर्मा है। नाम सुन कर कोई भी नहीं मानेगा की मैं नास्तिक हूँ। लेकिन ये सच है। मैं नास्तिक हूँ। आस्तिक से नास्तिक होने का सफर मेरे लिए आसान नहीं था। मेरा जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ, जहाँ सुबह से लेकर रात सोने तक कुछ न कुछ चलता ही रहता था। बचपन से ही धर्म और जाति को लेकर मेरे मन में सवाल उठते रहते थे जिनका मुझे कभी कोई ठीक जवाब नहीं मिला।

अपने सवाल को लेकर मैं सभी से बात करती थी। सब जवाब देने के बदले मुझे मुस्लिम बोल देते थे। मुझे गाली तक सुननी पड़ जाती थी। नास्तिक मैं दस साल की उम्र में ही बन गयी थी, जब मैंने टीवी पर रामायण देखी। उसमें आडम्बरों की भरमार थी। एक जो मुझे हजम नहीं हुई उस उम्र में वो थी खीर से बच्चे पैदा होना। उसको देख कर मैं इतना डर गयी कि मैंने कई महीने तक खीर नहीं खाई। ये तो मेरे सवालों की शुरुआत थी।  सवाल आते गए, उटपटांग जवाब मिलते रहे और इस सब के चलते ही एक दिन मैं पूण रूप से नास्तिक बन गयी।  आज मैं गर्व से कहती हूँ की मैं नास्तिक हूँ।।

बचपन में माँ ने मासी के पास रोका था पढ़ाई करने के लिए। मैं सेकंड स्टैण्डर्ड से डायरेक्ट पढ़ाई शुरू की। मासी लड़के परेशान बहुत करते, उनके के घर में मुझे अच्छा नहीं लगता था। मम्मी पापा जब आते, तो मैं डरकर उनके साथ घर जाने की जिद नहीं कर सकती थी। अकेलेपन में छोटे छोटे पेड़ों से शिकायत करती और खूब रोती। ऐसे ही 3 साल बीत गए।  फिर मैं मम्मी के पास आ गयी। पापा की दुलारी थी। पर अचानक पापा की डेथ हो गयी। वो समय ऐसा था कि पापा ने मुझे बुलाया और मेरे हॉस्पिटल पहुंचने से पहले पापा चले गए।

मैं भगवान से बहुत प्रार्थना की  की, एक बार पापा से बात करनी है। बहुत कसमें दिया लेकिन भगवान हो तब तो सुनेगा न! मैं बहुत छोटी थी, अपने दुःख को किसी को बता नहीं सकती। फिर माँ को मानसिक अवसादग्रस्त हो जाना मुझे और असहाय कर गया। फिर माँ की बजह से कोई न कोई रिश्तेदारों के यहां मुझे रुकना पड़ रहा था। सभीने खूब फायदा उठाया। मैं सब सहती रही। मेरा दुःख सुनने वाला, आंसू पोछने वाला कोई न था। फिर बड़ी हुई, और फिर मेरे पति आये मेरे जिंदगी में एक उम्मीद की किरण बन कर। तब तक इन भगवानों पर विश्वास उठ चुका था। अब मैं नास्तिक हूं।।

मैं नास्तिक हूं , और मुझे गर्व है। मेरे गाँव जो कि 30 घरों का छोटा सा गांव है, और 2 गुरुद्वारे हैं वहां, पर मैं नास्तिक हूं। रिश्तेदारों में भी कोई और नास्तिक नहीं है। मुझे देख कर मेरे बच्चे भी तर्क-वितर्क करने लगें हैं। और हस्बैंड भी सहयोग करते हैं।।

हमारे घर में मेरी माँ आस्तिक और पापा नास्तिक हैं। अपने माँ के करीब होने के कारण मैं भी आस्तिक ही थी। पर माँ और मैं अंधविश्वासी नहीं थे। मेरी माँ भी बिना कोई आडंबर किए साधारण तरीके से ही पूजा करती थी। जब मेरी शादी हुई, पति भी आस्तिक ही मिले। वे भी सिंपल तरीके से पूजा करते थे। पुराणों की कथाओं में भी खास विश्वास नहीं था।
मैं अपने पर्सनल प्रॉब्लम में इतनी खोई हुई थी कि इस बारे में ज्यादा सोचा नहीं। मुझे लगता था कि भगवान हो या ना हो कम से कम मैं कुछ देर उनका नाम लेकर पॉजिटिव एनर्जी पा सकती हूं। फिर मैं राजबाला जी के संपर्क में आई। उनसे बातें कर के बहुत तथ्य व तर्क संगत बातों का पता चला। फिर समझ आया कि जो चीज इतनी सन्देहास्पद है उसके पीछे क्यों दौड़े।

फिर मैं भी नास्तिक बन जाने की ठान ली। थोड़े दिन पहले मेरे पति ने मंदिर जाने की बात की तो मैं निडर हो के कहा कि मैं मंदिर के अंदर नहीं जाऊंगी। और मेरे पति ने भी मेरे इस निर्णय को सम्मान किया।

मैं ओडिशा की रहने वाली हूं। बचपन से ही घर में निरंतर धार्मिक कर्मकांड होते हुए देखती थी। और बचपन से ही दिमाग में वही सब बातें डाल दिया गया था कि भगवान  कुछ ऐसा है जिनसे डरना चाहिए, और पूजा करने से जो चाहोगे मिलेगा। अगर पूजा नहीं करोगे, तो भगवान तुम्हें दंडित करेंगे। ऐसा करोगे तो पाप होगा वैसा करोगे तो पुण्य होगा। परीक्षा के समय मंदिर जा कर नारियल फोड़ के आओगे, तो जरूर पास हो जाओगे।

मेरा मन इन सब बातों को ना छोड़ पा रहा था, न ठीक से ग्रहण कर पा रहा था। फिर शादी हुई। मेरे पति भी खूब धार्मिक प्रवृत्ति के थे। पर उनके अंदर भी द्वंद चल रहा था। फिर हमें दिल्ली प्रकाशनी के "सरिता" नामक एक पत्रिका पढ़ने को मिला। उसमें नास्तिकता के बारे में  बहुत सारे तर्कशील रचनाएं पढ़ने को मिली। फिर हमें  बहुत सारे प्रश्नों के उत्तर मिलते गए।

धीरे धीरे धर्म का कोहरा छंटने लगा। मन से डर कम होने लगा। आत्मविश्वास बढ़ने लगा। अब तो धर्म, भगवान, अंधविश्वास आदि ऐसा कोई भी शंका मन में नहीं है। हमारे परिवार में मैं, मेरा पति व बच्चा सभी सम्पूर्ण नास्तिक हैं, और स्वस्थ व सुखमय जीवन बिता रहे हैं।।

साभार: ममता नायक, दुर्गाबाला टुडू, जीत कौर, शिल्पी सिंह, सुधा शर्मा, सविता जीत, रंजीत कौर, सुनीता विजेता, लोपामुद्रा मिश्रा और राजबाला त्रिपाठी। यह लेख ‘नास्तिकता प्रचार अभियान’ से लिया गया है। इसके लिए सभी लेखिकाओं और इस ग्रुप का आभार।

संपादन: एडमिन, नास्तिक भारत